
Shaktipeeth Expressway: महाराष्ट्र में नागपुर से गोवा तक का सफर आने वाले वर्षों में पूरी तरह बदल सकता है। राज्य का प्रस्तावित 856 किलोमीटर लंबा शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे सिर्फ दो क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़क नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन, कारोबार और ग्रामीण विकास के लिए भी अहम परियोजना है। इसके लिए 13 जिलों के 409 गांवों में जमीन की नाप-जोख की प्रक्रिया शुरू की गई है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि जमीन अधिग्रहण कब पूरा होगा और निर्माण कब शुरू होगा?
प्रस्तावित शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे विदर्भ, मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र को जोड़ते हुए गोवा तक पहुंचेगा। संशोधित अलाइनमेंट के मुताबिक, यवतमाल में इसका सबसे लंबा 137 किलोमीटर का हिस्सा होगा। सोलापुर में 130 किलोमीटर और कोल्हापुर में 125 किलोमीटर का रूट प्रस्तावित है।
अन्य जिलों में वर्धा से 35, नांदेड़ से 20, हिंगोली से 70, परभणी से 60, बीड से 39, लातूर से 43, धाराशिव से 40, सतारा से 49, सांगली से 72 और सिंधुदुर्ग से 36 किलोमीटर का हिस्सा गुजरेगा।
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परियोजना से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 409 गांवों में से 155 गांवों में जॉइंट मेजरमेंट सर्वे पूरा हो चुका है, जबकि बाकी 254 गांवों में यह प्रक्रिया जारी है। पूरे प्रोजेक्ट के लिए करीब 8,760 हेक्टेयर जमीन की जरूरत बताई गई है।
योजना के अनुसार, दिसंबर 2027 तक जमीन अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद जनवरी 2028 से निर्माण शुरू करने की योजना है। हालांकि, ये निर्धारित लक्ष्य हैं; वास्तविक समयसीमा प्रशासनिक मंजूरियों, जमीन अधिग्रहण और अन्य प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।
इस एक्सप्रेसवे का नाम शक्तिपीठ रखने के पीछे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की सोच है। प्रस्तावित मार्ग से कोल्हापुर की महालक्ष्मी, धाराशिव की तुलजा भवानी और माहूर की रेणुका माता जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों तक पहुंच आसान बनाने की उम्मीद है। पंढरपुर और अक्कलकोट जाने वाले श्रद्धालुओं को भी बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिल सकता है।
इसके अलावा, बेहतर सड़क नेटवर्क से किसानों को कृषि उत्पाद बड़े बाजारों तक पहुंचाने, उद्योगों को परिवहन सुविधा मिलने और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है। हालांकि, इन फायदों का वास्तविक असर एक्सप्रेसवे के निर्माण और संचालन के बाद ही स्पष्ट होगा।
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