
Mamata Banerjee Next Plan: पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ऐसा बवंडर आया है, जिसकी कल्पना शायद कभी ममता बनर्जी ने भी नहीं की होगी। जो 'दीदी' कल तक दिल्ली से लेकर कोलकाता तक विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा मानी जा रही थीं, आज उनकी अपनी ही पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखरती दिख रही है। हालत यह है कि ममता बनर्जी के पास अब विधानसभा में सिर्फ 22 विधायकों और लोकसभा में महज 8 सांसदों का साथ बचा है। उनके करीबियों और पार्टी नेताओं पर चौतरफा दबाव है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस भयंकर संकट के बीच दीदी के पास अब आगे बढ़ने के सिर्फ 3 रास्ते बचे हैं। आइए समझते हैं कि बंगाल की राजनीति का यह 'पावर गेम' क्या है और ममता बनर्जी अब क्या कदम उठा सकती हैं...
इस पूरी कहानी की शुरुआत 6 मई को ममता बनर्जी के घर पर हुई एक मीटिंग से हुई थी। ममता ने शोभनदेव भट्टाचार्या को विपक्ष का नेता चुना, लेकिन पार्टी के कुछ विधायकों को यह फैसला रास नहीं आया। इस नाराजगी का चेहरा बने विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा। बात इतनी बढ़ी कि ऋतब्रत बनर्जी ने दिल्ली में बीजेपी नेताओं से मुलाकात की और देखते ही देखते TMC के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन पत्र विधानसभा स्पीकर को सौंप दिया। बागी गुट का सीधा आरोप है कि चुनाव में हार की असली वजह ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी और उनकी चुनावी रणनीति संभालने वाली कंपनी I-PAC है।
विधायकों के बाद अब सांसदों के भी बागी होने के भी खबरें हैं। दिल्ली में बीजेपी नेताओं के घर हुई एक सीक्रेट मीटिंग के बाद दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के 28 में से 20 लोकसभा सांसद बागी हो चुके हैं। सांसद काकोली घोष दस्तीदार इस बागी गुट की अगुवाई कर रही हैं और उन्होंने संसद में अलग बैठने की मांग भी की है।
1. जमीन पर उतरकर नए सिरे से पार्टी खड़ी करना
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस मुश्किल वक्त में जब चारों तरफ से रास्ते बंद दिख रहे हैं, तब ममता बनर्जी के सामने 3 विकल्प हैं। जिनमें से पहला जमीन पर उतरकर नए सिरे से पार्टी खड़ा करना है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ममता बनर्जी की पहचान हमेशा से एक 'फाइटर' नेता की रही है। साल 1998 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने अकेले दम पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई और साल 2011 में 34 साल पुरानी वामपंथी (Left) सरकार को उखाड़ फेंका था। पहले भी सुब्रत मुखर्जी और पंकज बनर्जी जैसे बड़े नेताओं ने उनका साथ छोड़ा था, लेकिन ममता अपनी निजी छवि के दम पर वापस लौटीं। ममता का वोटर उनके संगठन से ज्यादा उनके चेहरे पर भरोसा करता है। वह एक बार फिर जमीन पर उतरकर, अपने कैडर को मजबूत कर नए सिरे से लड़ाई शुरू कर सकती हैं।
2. बागी सांसदों को मनाना और कानूनी लड़ाई लड़ना
दूसरा रास्ता यह है कि ममता बनर्जी डैमेज कंट्रोल करें और नाराज सांसदों को मनाएं। उनके नेता कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बागियों के दावों को झूठा बता रहे हैं। पार्टी का कहना है कि 20 सांसदों के समर्थन वाली चिट्ठी अभी तक सामने नहीं आई है। ममता इस मामले को लोकसभा स्पीकर के सामने ले जा सकती हैं और कानूनी दांव-पेंच के जरिए बगावत को रोकने की कोशिश कर सकती हैं।
3. दिल्ली का रुख और कांग्रेस में पार्टी का विलय
तीसरा और सबसे आखिरी वाला रास्ता राष्ट्रीय राजनीति पर फोकस करना है। चुनाव के तुरंत बाद ममता बनर्जी दिल्ली पहुंचीं और लगातार दो दिन सोनिया गांधी से मुलाकात की। उन्होंने विपक्षी गठबंधन (INDIA ब्लॉक) की अगुवाई करने की इच्छा भी जताई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या ममता अपनी बची हुई पार्टी का कांग्रेस में विलय (Merge) कर देंगी? हालांकि, इसकी उम्मीद थोड़ी कम है, क्योंकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी जैसे लोग इस विचार के खिलाफ हैं। खुद ममता भी नहीं चाहेंगी कि उनकी सालों की मेहनत एक झटके में खत्म हो जाए।
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