
नई दिल्ली: दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Microsoft एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह उसकी नई टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर की गई छंटनी और H-1B वीज़ा को लेकर उठे विवाद हैं। कंपनी ने 4,800 कर्मचारियों की नौकरी खत्म करने का फैसला किया है। इसी बीच यह जानकारी सामने आई कि Microsoft को इसी साल H-1B वीज़ा प्रोग्राम के तहत 2,273 विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की मंजूरी मिली है। इन दोनों घटनाओं ने सोशल मीडिया से लेकर अमेरिकी राजनीतिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।
Microsoft ने अपने विभिन्न बिजनेस यूनिट्स में कर्मचारियों की संख्या घटाने का फैसला लिया है। सबसे बड़ा असर Xbox गेमिंग डिवीजन पर पड़ा है, जहां लगभग 1,600 नौकरियां प्रभावित हुई हैं। लेकिन इसी दौरान अमेरिकी आव्रजन विभाग (USCIS) के आंकड़ों में सामने आया कि कंपनी को हजारों H-1B वीज़ा मंजूर हुए हैं और कुछ आवेदन अभी भी लंबित हैं। यहीं से विवाद शुरू हुआ। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है, तब विदेशी कर्मचारियों की भर्ती क्यों जारी है?
Microsoft ने प्रभावित कर्मचारियों के लिए अपेक्षाकृत मजबूत सेवरेंस पैकेज घोषित किया है। कर्मचारियों को कम से कम 60 दिनों तक नियमित वेतन मिलता रहेगा। इसके अलावा, कई मामलों में कुल 39 सप्ताह तक की बेस सैलरी के बराबर सेवरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधा, योग्य कर्मचारियों के लिए स्टॉक वेस्टिंग और अन्य सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। हालांकि अंतिम पैकेज कर्मचारी की भूमिका और कंपनी में उसकी सेवा अवधि के अनुसार अलग-अलग होगा।
H-1B वीज़ा पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए नौकरी जाना केवल रोजगार का नुकसान नहीं होता, बल्कि अमेरिका में रहने का अधिकार भी खतरे में पड़ सकता है। आमतौर पर ऐसे कर्मचारियों को नई नौकरी खोजने या अपना वीज़ा स्टेटस बदलने के लिए 60 दिन का ग्रेस पीरियड मिलता है। मौजूदा समय में टेक सेक्टर में भर्ती की रफ्तार धीमी होने के कारण यह प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।
Microsoft की घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई यूज़र्स ने आरोप लगाया कि अमेरिकी नौकरियों की कीमत पर विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जा रही है। इसी बीच रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने H-1B कार्यक्रम को खत्म करने की मांग दोहराई। उनका आरोप है कि बड़ी टेक कंपनियां इस प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल कर अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त कर रही हैं। 'Project for Immigration Reform' जैसे संगठनों ने भी H-1B कार्यक्रम में व्यापक सुधार की मांग उठाई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा हो गया है। ट्रंप प्रशासन और वाइस-प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने H-1B वीज़ा प्रोग्राम में कथित धोखाधड़ी को लेकर एक बेहद आक्रामक रुख अपना लिया है। मिल्वौकी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वेंस ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा: "मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि फ़ेडरल लेबर डिपार्टमेंट ने उन विदेशी धोखेबाज़ों के ख़िलाफ़ दर्जनों समन जारी किए हैं और जांच शुरू की है जो H-1B वीज़ा प्रोग्राम का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।" इस जांच के रडार पर कॉग्निज़ेंट (Cognizant) जैसी बड़ी आईटी कंपनियां भी हैं। सरकार का सीधा आरोप है कि ये प्रोग्राम अमेरिकी नौकरियों की सुरक्षा को सेंध लगा रहे हैं। इससे पहले, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B आवेदनों पर $100,000 की भारी-भरकम फ़ीस लगाने का एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर भी जारी किया था ताकि कंपनियां इसका इस्तेमाल कम करें। हालांकि, एक फ़ेडरल जज ने इस पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि ऐसा टैक्स लगाने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस के पास है।
इन तीखे आरोपों के बीच माइक्रोसॉफ्ट रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है। कंपनी के प्रवक्ता ने फॉक्स न्यूज़ के सामने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि वे अमेरिकी कर्मचारियों के बजाय वीज़ा होल्डर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्रवक्ता का कहना था, "ये फ़ैसले बिज़नेस की ज़रूरतों पर आधारित हैं, न कि वीज़ा स्टेटस पर। इस छंटनी से खुद कई H-1B कर्मचारी भी प्रभावित हुए हैं।" वहीं दूसरी ओर, Xbox की चीफ़ एग्जीक्यूटिव आशा शर्मा ने एक लीक हुए आंतरिक मेमो में बिज़नेस की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला दिया है। उन्होंने लिखा, "आज हमारा बिज़नेस ठीक नहीं चल रहा है। हम ऐसे मार्जिन पर काम कर रहे हैं जो इसी तरह के प्लेटफ़ॉर्म और पब्लिशिंग बिज़नेस की तुलना में 3-10 गुना कम हैं।" उन्होंने इस छंटनी को गेमिंग डिवीज़न को "रीसेट" करने की एक मजबूरी बताया।
दिलचस्प और दुखद बात यह है कि सोशल मीडिया पर कुछ यूज़र्स ने आशा शर्मा की भारतीय मूल की पृष्ठभूमि को लेकर भी उन पर निशाना साधना शुरू कर दिया, जबकि हकीकत यह है कि उनका जन्म अमेरिका के विस्कॉन्सिन में ही हुआ था। रिपब्लिकन कांग्रेसमैन राइली मूर जैसे आलोचक अब इस पूरे सिस्टम को खत्म करने की मांग कर रहे हैं, जिससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में बड़ी टेक कंपनियों और अमेरिकी सरकार के बीच का यह टकराव एक नया राजनीतिक मोड़ लेने वाला है।
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