
दुनिया इस वक्त एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां हर बड़ी ताकत अपनी सुरक्षा रणनीति पर दोबारा सोचने को मजबूर है।रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने हालात और जटिल कर दिए हैं। अब इसी बीच एक नई चर्चा तेज हो गई है, क्या यूरोप, अमेरिका के बिना अपनी सुरक्षा संभालने की तैयारी कर रहा है?
North Atlantic Treaty Organization (NATO) दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन माना जाता है। इसमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देश शामिल हैं। इसका सबसे मजबूत आधार है Article 5, जिसके मुताबिक अगर एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो इसे पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। यही वजह है कि छोटे यूरोपीय देश भी खुद को अमेरिका जैसी ताकत के सुरक्षा कवच में सुरक्षित मानते हैं।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी के बाद NATO को लेकर अमेरिका का रुख बदला हुआ नजर आ रहा है। ट्रंप पहले भी NATO देशों पर ज्यादा खर्च न करने का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन अब उनके बयान और सख्त हो गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप यूरोपियन देशों की आलोचना करते हुए उन्हें कमजोर बता चुके हैं और यहां तक संकेत दे चुके हैं कि अगर अमेरिका की प्राथमिकताओं के साथ सहयोग नहीं हुआ, तो वह अपना समर्थन कम कर सकते हैं।
अमेरिकी अखबार The Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप अब एक बैकअप प्लान पर काम कर रहा है। इसे अनौपचारिक रूप से “European NATO” कहा जा रहा है।
इस प्लान में-
हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि इसका मकसद NATO को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना है।
यूरोप की इस रणनीति के पीछे सबसे बड़ा कारण Russia को माना जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप लगातार खतरे को महसूस कर रहा है। अगर भविष्य में अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है, तो यूरोप को खुद ही अपनी सुरक्षा संभालनी होगी, यही सोच इस नए प्लान के पीछे है।
जर्मनी इस पहल का खुलकर समर्थन कर रहा है। जर्मनी लंबे समय से यूरोप की डिफेंस पॉलिसी को लेकर चिंतित रहा है। वहीं फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब का कहना है कि अब समय आ गया है जब यूरोप को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने भी माना कि NATO जरूरी है, लेकिन यूरोप को अपनी भूमिका और मजबूत करनी होगी।
इसी बीच “Islamic NATO” को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं। यह कोई आधिकारिक संगठन नहीं है, लेकिन सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग को इस नाम से जोड़ा जा रहा है। 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए एक डिफेंस एग्रीमेंट में भी NATO के Article 5 जैसा क्लॉज शामिल किया गया है, यानी एक देश पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा।
दुनिया की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। अगर अमेरिका NATO से दूरी बनाता है, तो यह सिर्फ यूरोप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सुरक्षा ढांचे को बदल सकता है।
यूरोप का यह ‘Plan B’ सिर्फ एक रणनीति नहीं, बल्कि बदलते समय का संकेत है। अब सवाल यह है-क्या NATO पहले जैसा मजबूत रहेगा, या दुनिया एक नए सैन्य संतुलन की ओर बढ़ रही है? आने वाले समय में इसका जवाब तय करेगा कि वैश्विक सुरक्षा का भविष्य कैसा होगा।
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