‘हमें अपने हिंदू राजा वापस चाहिए’-नेपाल में चुनाव से पहले क्यों गूंज रहा है राजशाही का नारा?

Published : Feb 14, 2026, 01:59 PM IST

Why Nepal Wants Hindu King Back? क्या नेपाल में राजशाही वापस आएगी? हज़ारों समर्थक राजा ज्ञानेंद्र शाह के लौटने की मांग कर रहे हैं। Gen Z की नाराज़गी, राजनीतिक अस्थिरता और भारत-चीन के दबाव के बीच, 5 मार्च 2026 का चुनाव इतिहास तय करेगा। 

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Nepal Election 2026: नेपाल में एक बार फिर इतिहास जैसे करवट ले रहा है। काठमांडू की सड़कों पर गूंजते नारे-“हमें अपने हिंदू राजा वापस चाहिए”-सिर्फ भावनात्मक आवाज़ नहीं, बल्कि देश की मौजूदा राजनीति पर एक बड़ा सवाल हैं। आम चुनाव से ठीक पहले राजशाही की बहाली की मांग यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या जनता लोकतंत्र से निराश हो चुकी है?

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क्या ज्ञानेंद्र शाह की वापसी सिर्फ भावनाओं का उबाल है?

जब ज्ञानेंद्र शाह काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचे, तो हज़ारों समर्थक सुरक्षा प्रतिबंधों के बावजूद बाहर जमा हो गए। तख्तियों पर लिखा था-“देश को बचाने के लिए राजा को वापस लाओ”। सवाल यह है कि 15 साल बाद भी राजशाही की यह यादें इतनी ज़िंदा क्यों हैं?

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2008 के बाद नेपाल की राजनीति में क्या बिगड़ गया?

2008 में नेपाल ने राजशाही खत्म कर खुद को फेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक घोषित किया। लेकिन इसके बाद 32 से ज़्यादा सरकारें बनीं और गिरीं। गठबंधन अस्थिर रहे, नेतृत्व बदला, लेकिन आम जनता की समस्याएं जस की तस रहीं। भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और कमजोर शासन ने लोगों का भरोसा तोड़ा।

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Gen Z क्यों कह रही है-‘राजा ही बेहतर था’?

नेपाल की Gen Z आज सड़कों पर है। सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी आंदोलनों तक, युवा खुलकर कह रहे हैं कि मौजूदा सिस्टम ने उन्हें सिर्फ वादे दिए। उनके लिए राजशाही नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि स्टेबिलिटी का प्रतीक बनती जा रही है।

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भारत-चीन के बीच नेपाल की राजनीति कितनी दबाव में है?

नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील बनाती है। भारत और चीन दोनों का असर साफ दिखता है। अमेरिका की MCC ग्रांट और चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजनाएं नेपाल की राजनीति को लगातार प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में लोगों के मन में यह डर गहराता जा रहा है-क्या देश के फैसले बाहर से तय हो रहे हैं?

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क्या चुनाव से पहले राजशाही की मांग सत्ता को हिला देगी?

राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, कमल थापा, नवराज सुबेदी और दुर्गा प्रसाई जैसे नेता खुलकर कह रहे हैं कि जब तक हिंदू राजा की बहाली पर बात नहीं होगी, चुनाव का कोई मतलब नहीं। यह सीधे-सीधे सिस्टम को चुनौती है।

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आगे क्या? लोकतंत्र या राजतंत्र?

प्रधानमंत्री सुशीला कार्की लोगों से शांतिपूर्ण चुनाव में भाग लेने की अपील कर रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जनता के एक हिस्से के मन में लोकतंत्र को लेकर गहरी निराशा बैठ चुकी है। 5 मार्च 2026 के चुनाव यह तय करेंगे कि नेपाल आगे किस रास्ते पर जाएगा-सुधरे हुए लोकतंत्र की ओर या इतिहास की ओर वापसी?

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