9 दिन तक नेपाल की अंधेरी सुरंग में कैद रहे दो मजदूर, कीचड़ भरा पानी पीकर बचाई जान; फिर हुआ चमत्कार

Published : Sep 08, 2026, 07:15 PM IST
Nepal Flood Rescue Two Hydropower Workers Found Alive After 9 Days Trapped Inside Tunnel

सार

नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ के बाद दो हाइड्रोपावर कर्मचारी नौ दिन तक अंधेरी सुरंग में फंसे रहे। कीचड़ भरा पानी पीकर दोनों ने जिंदगी बचाई और 4 सितंबर को जिंदा बाहर निकाले गए। इस रेस्क्यू ने सैकड़ों लापता लोगों के लिए उम्मीद जगाई।

सोचिए, चारों तरफ अंधेरा हो, सिर के ऊपर मलबे का पहाड़ हो और बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर न आ रहा हो। खाने को कुछ नहीं, पीने के लिए साफ पानी नहीं और यह भी पता नहीं कि बचाव दल कब पहुंचेगा। नेपाल में कबीर महारजन और संजय साह ने ऐसी ही भयावह स्थिति में नौ दिन गुजारे। 4 सितंबर को जब दोनों को सुरंग से जिंदा बाहर निकाला गया, तो यह राहत अभियान अचानक उम्मीद की सबसे बड़ी कहानी बन गया।

160 मीटर दूर था बाहर निकलने का रास्ता

रायटर्स के अनुसार, 26 अगस्त को लैंगटांग लिरुंग पर्वत के पास ग्लेशियर टूटने के बाद भारी मलबे और पानी ने त्रिशूली घाटी में तबाही मचा दी। बाढ़ की चपेट में 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट आए, जहां करीब 900 कर्मचारी मौजूद थे। Upper Trishuli 3A परियोजना में काम कर रहे महारजन और साह बाढ़ के बीच एक ऐसे हिस्से में पहुंच गए, जहां हवा बची हुई थी। इंजीनियरिंग नक्शों के मुताबिक यह जगह निकास से करीब 160 मीटर दूर थी। बाहर हालात लगातार बिगड़ रहे थे। अंदर दोनों के सामने जिंदगी बचाने की चुनौती थी।

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कीचड़ भरा पानी बना जिंदगी का सहारा

नौ दिनों तक वह एयर पॉकेट ही दोनों का आशियाना और जेल बना रहा। संजय साह ने हिम्मत बनाए रखने के लिए प्रार्थनाओं का सहारा लिया। वहीं कबीर ने उसी सुरंग में जमा कीचड़ भरा पानी पीकर अपनी जान बचाई। बाहर उनकी पत्नी हीरा शोभा लगातार फोन करती रहीं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जब उन्हें तबाही की तस्वीरें दिखाई गईं तो उन्हें लगा कि शायद उनके पति अब जिंदा नहीं हैं। फिर भी उन्होंने अपने 15 और 10 साल के बेटों के सामने उम्मीद नहीं टूटने दी।

बचाव दल ने क्यों नहीं छोड़ी उम्मीद?

रेस्क्यू टीम को मलबे के बीच ऑक्सीजन के संभावित पॉकेट मिलने की उम्मीद थी। करीब 7,500 घर तबाह होने के बीच बचाव दल को यह तय करना था कि सबसे पहले कहां खुदाई की जाए। 3A परियोजना इसलिए प्राथमिकता में रही क्योंकि वहां बहुमंजिला संरचना और वेंटिलेशन सिस्टम के कारण हवा के फंसे होने की संभावना थी।

नौ दिन बाद जब दोनों को बाहर निकाला गया तो यह सिर्फ दो लोगों का बचाव नहीं था। इसने उन 121 अन्य श्रमिकों के लिए भी उम्मीद जगा दी, जिनके सोमवार तक सुरंगों में फंसे होने की आशंका जताई जा रही थी। अस्पताल में होश आने के बाद कबीर ने अपनी पत्नी को भी पहचान नहीं पाया। उन्होंने उल्टा पूछा कि उन्हें अब तक बिस्तर क्यों नहीं दिया गया। नौ दिनों की वह भयावह कैद उनके लिए शायद अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

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