
हिमालय को अक्सर एशिया का ‘वॉटर टावर’ कहा जाता है। इसकी बर्फ और ग्लेशियर करोड़ों लोगों के लिए पानी का अहम स्रोत हैं। लेकिन नेपाल में हालिया ग्लेशियर से जुड़ी तबाही ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर हिमालय इसी रफ्तार से गर्म होता रहा तो भारत के लिए आने वाले साल कैसे होंगे?
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, नेपाल पिछले तीन दशकों से कुछ अधिक समय में अपनी करीब एक-तिहाई बर्फ खो चुका है। वहीं पिछले दशक में नेपाल के ग्लेशियर उससे पहले के दशक की तुलना में करीब 65 फीसदी ज्यादा तेजी से पिघले।
बढ़ता तापमान ग्लेशियरों को पीछे धकेलने के साथ पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है। पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय तक जमी रहने वाली जमीन कमजोर होने पर चट्टानों के खिसकने और लैंडस्लाइड का खतरा बढ़ सकता है।
भारत में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन और अचानक बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील हैं। पूर्वी हिमालय में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और आगे असम तक इसका असर पहुंच सकता है।
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ग्लेशियर पीछे हटने पर उनके आसपास ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ सकता है। इन झीलों के प्राकृतिक बर्फ या मलबे से बने बांध टूटने पर GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड आ सकती है। ऐसी बाढ़ बेहद कम समय में पहाड़ों से नीचे की ओर भारी मात्रा में पानी और मलबा ला सकती है। इससे सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं और नदी किनारे बसे इलाकों को नुकसान पहुंच सकता है।
पुराने वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, 2050 तक गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में ग्लेशियर क्षेत्रफल में करीब 35 से 45 फीसदी तक कमी का अनुमान लगाया गया था। सिंधु बेसिन के लिए यह अनुमान करीब 20 से 28 फीसदी था। गंगा बेसिन में इसका असर उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल तक पानी और बाढ़ के पैटर्न पर पड़ सकता है। ब्रह्मपुत्र बेसिन में अरुणाचल प्रदेश और असम विशेष रूप से संवेदनशील हो सकते हैं।
ग्लेशियर तेजी से पिघलने पर शुरुआती दौर में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। लेकिन जब ग्लेशियर लगातार छोटे होते जाएंगे तो गर्मियों में उनसे मिलने वाला पानी कम हो सकता है। यही वजह है कि हिमालय का पिघलना केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है। इसका संबंध भारत की खेती, पीने के पानी, हाइड्रोपावर और करोड़ों लोगों की नदी-आधारित अर्थव्यवस्था से है। आने वाले दशकों में भारत के सामने चुनौती दोहरी हो सकती है, पहाड़ों में अचानक बाढ़ का खतरा और लंबे समय में पानी की बढ़ती कमी।
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