
तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में, कुन्नूर के पास एक छोटी सी जगह है- डेनालाई टी एस्टेट हाउस। ये सिर्फ एक चाय का बागान नहीं, बल्कि उन बेसहारा बुज़ुर्गों के लिए एक अनोखा घर बन गया है, जिनका कोई नहीं है। इस नेक काम की शुरुआत राममूर्ति और उनकी पत्नी ने की थी, जब उन्होंने अपने बच्चों द्वारा छोड़े गए एक बुज़ुर्ग जोड़े को पनाह दी। आज दो दशक बाद, यह आश्रम दर्जनों बुज़ुर्गों का घर है, जिन्हें कहीं और कोई आसरा नहीं मिला।
उस समय राममूर्ति तमिलनाडु स्वास्थ्य विभाग में कुष्ठ रोग (leprosy) मैनेजमेंट सेक्शन में काम करते थे। उन्हें कुष्ठ रोग से पीड़ित एक बुज़ुर्ग जोड़ा मिला, जिसे उनके परिवार ने छोड़ दिया था। उन्हें ठुकराने के बजाय, राममूर्ति उन्हें अपने घर ले आए। जल्द ही, और भी बुज़ुर्ग उनके घर आने लगे। आसपास के इलाकों में खबर फैल गई कि ये कपल बेघर बुज़ुर्गों को मुफ्त में रहने की जगह दे रहा है। राममूर्ति को ऐसे कई फोन आने लगे, जिनमें ऐसे बुज़ुर्गों के बारे में बताया जाता था जिनके पास न खाना था, न घर और न ही इलाज के पैसे। ये वो लोग थे जिन्हें या तो उनके परिवार ने छोड़ दिया था या जो बीमारी और गरीबी के कारण लाचार हो गए थे।
इसके बाद, इस कपल ने अपने चाय बागान पर बने एक पुराने घर को इन बेसहारा बुज़ुर्गों के लिए एक स्थायी ठिकाने में बदल दिया। साल 2005 में, उन्होंने औपचारिक रूप से MN ट्रस्ट की स्थापना की, जिसका नाम राममूर्ति के माता-पिता के नाम पर रखा गया। राजेश्वरी इसकी मैनेजिंग ट्रस्टी बनीं। बताया जाता है कि कपल ने अपनी कमाई और चाय बागान से होने वाले मुनाफे का बड़ा हिस्सा इन लोगों की देखभाल में लगा दिया।
समय के साथ यह आश्रम बढ़ता गया। आज यहां करीब 50 बुज़ुर्ग रहते हैं, जिनमें से कुछ की उम्र 90 साल से भी ज़्यादा है। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग सेक्शन हैं, जहां उनके लिए बिस्तर और बाथरूम की सुविधा है। यहां रहने वालों को मुफ्त खाना, कपड़े, दवाइयां और दूसरी ज़रूरी चीज़ें दी जाती हैं।
आश्रम में हर चीज़ की प्लानिंग बहुत बारीकी से की गई है। दिन में कब चाय मिलेगी, कब नाश्ता और कब खाना, इसका पूरा शेड्यूल दीवारों पर लगा है। गर्म पानी के लिए सोलर हीटिंग सिस्टम है और पीने के लिए फ़िल्टर्ड पानी की व्यवस्था है। मेडिकल स्टाफ हमेशा मौजूद रहता है और ज़रूरत पड़ने पर पास के स्वास्थ्य केंद्रों में भी ले जाया जाता है।
इस आश्रम की एक और खास बात है यहां लोगों के इमोशनल हेल्थ का ध्यान रखना। यहां रहने वाले लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं, एक-दूसरे से बात करते हैं और सोशल गैदरिंग में हिस्सा लेते हैं। अकेलेपन से जूझ रहे बुज़ुर्गों के लिए यह एक बड़ा सहारा है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी, इस आश्रम ने अपने लोगों को वायरस से बचाने के लिए वैक्सीनेशन कैंप लगाए और बचाव के सारे उपाय किए। लॉकडाउन के मुश्किल दौर में भी आश्रम का काम पहले की तरह ही चलता रहा।
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