किडनी ट्रांसप्लांट कराने से पहले जान लें ये 9 बड़े नियम, वरना बाद में पड़ सकता है पछताना

Published : Jun 27, 2026, 12:58 PM IST
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सार

NOTTO के नए नियम के तहत किडनी ट्रांसप्लांट अस्पतालों को अब सर्वाइवल रेट, मौतें, ग्राफ्ट फेलियर और फॉलो-अप डेटा सार्वजनिक करना होगा, ताकि मरीज बेहतर जानकारी के आधार पर अस्पताल चुन सकें।

NOTTO Kidney Transplant Rules: भारत के हेल्थकेयर सेक्टर से इस वक्त की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आ रही है, जिसने देश के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों और ट्रांसप्लांट सेंटर्स के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) ने एक ऐसा क्रांतिकारी और अभूतपूर्व फैसला लिया है, जो अब तक बंद कमरों और फाइलों में दफन रहने वाले राज को जनता के सामने बेनकाब कर देगा। NOTTO ने पूरे भारत में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले अस्पतालों के लिए 'सर्वाइवल रेट्स' (मरीज के जीवित रहने की दर), मौतों का आंकड़ा और ग्राफ्ट फेलियर (अंग प्रत्यारोपण का विफल होना) के डेटा को सार्वजनिक करना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया है। आइए जानते हैं कूटनीति और चिकित्सा के इस बड़े फैसले के पर्दे के पीछे की पूरी कहानी।

अब तक क्या छिपा रहे थे अस्पताल? नामी सेंटर्स के प्रदर्शन पर गहरा सस्पेंस!

अब तक का कड़वा सच यह था कि मरीजों और उनके तीमारदारों के पास यह जानने का कोई ठोस जरिया नहीं था कि सर्जरी के बाद कोई विशेष अस्पताल वास्तव में कैसा प्रदर्शन कर रहा है। अस्पताल अक्सर अपनी वेबसाइटों और विज्ञापनों पर 'सफल ट्रांसप्लांट की संख्या' का बोर्ड लगाकर भारी-भरकम फीस वसूलते थे। लेकिन, सर्जरी के कुछ महीनों या सालों बाद कितने मरीजों की जान गई, कितनी किडनियां फेल हुईं, इसका डेटा शायद ही कभी सामने आता था। NOTTO के डायरेक्टर डॉ. अनिल कुमार द्वारा जारी इस नए हंटर ने इसी सस्पेंस को खत्म कर दिया है। अब केवल अस्पताल की 'ब्रांड वैल्यू' या चमक-दमक देखकर नहीं, बल्कि उसके क्लिनिकल ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर मरीज फैसला करेंगे।

वो 9 कड़े नियम: अब वेबसाइट पर डालना होगा मौत और नाकामी का पूरा कच्चा चिट्ठा

NOTTO की नई गाइडलाइंस के मुताबिक, अब हर ट्रांसप्लांट सेंटर को एक स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग फॉर्मेट के तहत अपनी वेबसाइट पर निम्नलिखित गोपनीय डेटा को प्रमुखता से फ्लैश करना होगा:

  • मरीज के जीवित रहने की वास्तविक दर (Survival Rates)
  • ट्रांसप्लांट के बाद हुई मौतों की कुल संख्या और उनका प्रतिशत
  • ग्राफ्ट फेलियर (किडनी खराब होने) की दर
  • डिस्चार्ज के समय मरीज की असल स्थिति
  • 6 महीने, 1 साल, 3 साल और 5 साल का कड़ा फॉलो-अप डेटा
  • फॉलो-अप के दौरान अचानक गायब या संपर्क से बाहर हुए मरीजों का विवरण

इनकम्पैटिबल ट्रांसप्लांट और डोनर का संकट: क्या मरीजों को मिलेगी नई जिंदगी?

इस ऐतिहासिक बदलाव के बीच, रिपोर्ट में किडनी ट्रांसप्लांट की उन चुनौतियों का भी जिक्र किया गया है जो मरीजों के लिए अक्सर जिंदगी और मौत का सवाल बन जाती हैं। जहां 'लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट' में कम इंतजार और लंबी जिंदगी की उम्मीद होती है, वहीं 'मृत डोनर (Deceased Donor)' के मामलों में सही किडनी के लिए सालों का लंबा और दर्दनाक इंतजार करना पड़ता है। इसमें रिजेक्शन का खतरा भी ज्यादा होता है। इसके अलावा, ब्लड ग्रुप का मेल न खाना (Incompatibility) हमेशा से एक अभेद्य दीवार रहा है। लेकिन, अब 'ABO-इनकम्पैटिबल' जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से अलग ब्लड ग्रुप होने पर भी सफल ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं, और नए नियमों के बाद मरीजों को यह साफ-साफ पता चल सकेगा कि कौन सा अस्पताल इस जटिल तकनीक में वाकई माहिर है।

824 अस्पतालों पर सीधी नजर: 'रजिस्ट्री' के चक्रव्यूह में फंसे दिग्गज

इस नए नियम को लागू करने के लिए NOTTO ने पूरे देश के 824 ट्रांसप्लांट सेंटर्स को 'नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री' से सीधे लिंक कर दिया है। इन सभी सेंटर्स को नियमित रूप से अपना फॉलो-अप डेटा इस सरकारी सिस्टम में दर्ज करना होगा। जानकारों का मानना है कि इस पारदर्शिता से अस्पतालों के बीच मरीजों की जान बचाने और बेहतर देखभाल देने की एक स्वस्थ होड़ शुरू होगी। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आंकड़ों को देखते समय मरीजों की जटिलता को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि जो बड़े सेंटर्स बेहद गंभीर या हाई-रिस्क केस लेते हैं, उनके आंकड़े स्वाभाविक रूप से सामान्य अस्पतालों से अलग हो सकते हैं। इस नए नियम से अब मरीजों को सर्जरी से पहले 'इन्फॉर्म्ड कंसेंट' (सोच-समझकर दी गई सहमति) का वास्तविक अधिकार मिलेगा, जिससे भारत का ऑर्गन ट्रांसप्लांट सिस्टम वैश्विक स्तर पर बेहद पारदर्शी और जवाबदेह बन जाएगा।

लिविंग डोनर या मृत डोनर…किसमें ज्यादा फायदा?

विशेषज्ञों के अनुसार लिविंग डोनर किडनी ट्रांसप्लांट में प्रतीक्षा अवधि कम होती है, सर्जरी पहले से तय की जा सकती है और प्रत्यारोपित किडनी अक्सर तुरंत काम करना शुरू कर देती है। ऐसे मामलों में लंबे समय तक बेहतर सर्वाइवल रेट और कम जटिलताएं देखने को मिलती हैं। वहीं मृत डोनर ट्रांसप्लांट में मरीजों को कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है। इसके अलावा अंग के देर से काम करने और रिजेक्शन का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक रहता है।

ब्लड ग्रुप अलग होने पर भी बढ़ी उम्मीद

पहले ब्लड ग्रुप मेल न खाने पर किडनी ट्रांसप्लांट बेहद मुश्किल माना जाता था। लेकिन अब ABO-Incompatible Kidney Transplant जैसी आधुनिक तकनीकों की वजह से अलग ब्लड ग्रुप वाले डोनर और मरीज के बीच भी सफल ट्रांसप्लांट संभव हो रहे हैं। इससे अधिक मरीजों को समय पर किडनी मिलने की संभावना बढ़ी है।

मरीजों को कैसे मिलेगा सीधा फायदा?

नई व्यवस्था के लागू होने के बाद मरीज अस्पताल का चयन अधिक सोच-समझकर कर सकेंगे। डॉक्टर और मरीज के बीच इलाज को लेकर पारदर्शी बातचीत बढ़ेगी, सर्जरी से पहले बेहतर जानकारी के साथ सहमति ली जाएगी और ट्रांसप्लांट सेंटरों की गुणवत्ता पर लगातार निगरानी रखी जा सकेगी। इसके साथ ही अस्पतालों पर बेहतर परिणाम देने का दबाव भी बढ़ेगा, जिससे मरीजों की देखभाल और फॉलो-अप सेवाओं में सुधार आने की उम्मीद है।

 

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