
Lucknow Murder Case: लखनऊ में गुरुवार को हुए दिल दहला देने वाले डबल मर्डर और सुसाइड केस ने हर किसी को सन्न कर दिया है। SBI में काम करने वाले मानस बाजपेयी ने अपनी पत्नी दिव्या मिश्रा और अपनी बीमार बहन शीबा को गोली मार दी। इसके बाद उसने खुद को भी मौत के घाट उतार लिया। दिव्या फेमस यूट्यूबर प्रज्ञा मिश्रा की बहन थीं। इस पूरी घटना में सबसे ज्यादा चर्चा उस आखिरी वॉट्सऐप स्टेटस (WhatsApp Status) की हो रही है, जो मानस ने वारदात से ठीक पहले लगाया था। अब सवाल ये उठता है कि किसी अपराध की जांच में मोबाइल, वॉट्सऐप, CCTV, लोकेशन और दूसरे डिजिटल रिकॉर्ड्स कितने अहम होते हैं? क्या सिर्फ किसी वॉट्सऐप स्टेटस का स्क्रीनशॉट कोर्ट में सबूत बन सकता है? कौन-कौन सी चीजें डिजिटल सबूत (Digital Evidence) मानी जाती हैं। आइए जानते हैं जवाब...
आसान तरह से समझें तो मोबाइल, कंप्यूटर, कैमरा या किसी दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में मौजूद ऐसी जानकारी जो किसी मामले से जुड़ी हो, डिजिटल सबूत के दायरे में आ सकती है। इसमें वॉट्सऐप चैट, Email, फोटो, वीडियो, CCTV फुटेज, कॉल रिकॉर्ड्स (Call Records), लोकेशन डेटा (Location-related Data) डिजिटल फाइलें और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स रिकॉर्ड्स (Electronic Records) जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं।
भारत में अब डिजिटल एविडेंस (Digital Evidence) के लिए BSA (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) लागू है। यह कानून 1 जुलाई 2024 से देशभर में लागू हुआ। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) या डिजिटल रिकॉर्ड (Digital Record) को सिर्फ इसलिए सबूत (Evidence) से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह डिजिटल रूप में है। हालांकि, उसकी स्वीकार्यता (Admissibility) के लिए कानून में तय शर्तें पूरी करनी होती हैं। यानी बात सिर्फ यह नहीं है कि 'फोन में कुछ मिला या नहीं।' सवाल यह भी होता है कि वह रिकॉर्ड असली है या नहीं, किस डिवाइस से आया, उसे किस तरह हासिल किया गया और उसे कोर्ट में सही तरीके से पेश किया जा सकता है या नहीं।
कानून के जानकार बताते हैं कि मान लीजिए किसी वॉट्सऐप स्टेटस का स्क्रीनशॉट आपके पास है। क्या सिर्फ उस तस्वीर को देखकर यह मान लिया जाएगा कि वही व्यक्ति उस स्टेटस का लेखक था और उसमें लिखी हर बात सच है? ऐसा सीधे नहीं कहा जा सकता है। किसी स्क्रीनशॉट की मौजूदगी और उसके कोर्ट में सबूत के रूप में स्वीकार होने की प्रक्रिया दो अलग बातें हैं। कोर्ट के सामने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रामाणिकता (Authenticity) और उससे जुड़ी दूसरी कानूनी शर्तें भी अहम हो सकती हैं। BSA की 'Section 61' इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड को मान्यता देती है, जबकि 'Section 63' इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता से जुड़ी शर्तें (Conditions) बताती है। कानून में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को कुछ तय शर्तें पूरी होने पर डॉक्यूमेंट के रूप में स्वीकार करने का प्रावधान है। इसलिए 'स्क्रीनशॉट है, मतलब सबूत पक्का है' कहना सही तरीका नहीं होगा। जांच में यह भी देखा जा सकता है कि स्क्रीनशॉट कहां से आया, ओरिजनल रिकॉर्ड (Original Record) उपलब्ध है या नहीं, उसमें कोई बदलाव, तो नहीं किया गया और डिजिटल रिकॉर्ड को किस तरीके से सुरक्षित और पेश किया गया।
मान लीजिए किसी व्यक्ति के वॉट्सऐप स्टेटस का स्क्रीनशॉट सामने आया। जांच करने वाली एजेंसी के लिए अगला सवाल हो सकता है, क्या ओरिजनल डिजिटल रिकॉर्ड (Original Digital Record) या उससे जुड़ा भरोसेमंद सोर्स उपलब्ध है? डिजिटल सबूत में सोर्स, डिवाइस और रिकॉर्ड की प्रामाणिकता बहुत मायने रखती है। BSA की 'Section 63' में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के लिए शर्तें दी गई हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को बनाने, रखने या प्रॉसेस करने वाले कंप्यूटर या कम्युनिकेशन डिवाइस से जुड़ी शर्तें भी शामिल हैं। कानून में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के साथ सर्टिफिकेट (certificate) से जुड़ा प्रावधान भी है। इसका मतलब यह नहीं कि हर वॉट्सऐप स्क्रीनशॉट बेकार है। बल्कि मतलब यह है कि डिजिटल सबूत को भी बाकी सबूत की तरह जांच और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
हां, किसी मामले से संबंधित वॉट्सऐप चैट (WhatsApp Chat) जांच में महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन फिर वही सवाल सामने आता है, क्या चैट असली है? किसके फोन से मिली? उसका सोर्स क्या है? उसमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई? यही वजह है कि सिर्फ किसी चैट की तस्वीर देखकर पूरी कहानी तय करना ठीक नहीं है। किसी केस में चैट के साथ दूसरे रिकॉर्ड्स को भी देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए समय, कॉल रिकॉर्ड्स, CCTV, लोकेशन से जुड़ी जानकारी (Location-related Information) और दूसरे उपलब्ध सबूत (Available Evidence) को मिलाकर घटनाक्रम को समझने की कोशिश की जा सकती है। एक डिजिटल रिकॉर्ड अकेले पूरी कहानी बताए, यह जरूरी नहीं।
CCTV फुटेज भी इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड हो सकता है और किसी घटना की जांच में उसका महत्व हो सकता है। मान लीजिए किसी बैंक, सड़क, घर, दुकान या दूसरी जगह का CCTV उस समय का फुटेज रिकॉर्ड कर रहा था, जब कोई महत्वपूर्ण घटना हुई। जांच में उस फुटेज को घटनाक्रम के दूसरे हिस्सों से मिलाया जा सकता है। लेकिन CCTV में कुछ दिख जाना और उससे किसी व्यक्ति की पहचान या किसी तथ्य का अंतिम निष्कर्ष निकल जाना एक ही बात नहीं है। फुटेज की क्वॉलिटी, टाइमस्टैंप (timestamp), सोर्स (Source), कंटीन्यूटी (Continuity) और उसके सुरक्षित तरीके से उपलब्ध होने जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यानी CCTV कैमरा लगा होना अपने आप में पूरी कहानी नहीं है।
किसी केस में कॉल से जुड़े रिकॉर्ड्स (Call-related records) भी जांच का हिस्सा हो सकते हैं। किस नंबर से किस नंबर पर संपर्क हुआ, कब संपर्क हुआ और उपलब्ध रिकॉर्ड में क्या जानकारी है, इन चीजों को घटनाक्रम की टाइमलाइन समझने में इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन यहां भी एक जरूरी बात है कि कॉल रिकॉर्ड का मतलब बातचीत की पूरी रिकॉर्डिंग होना नहीं है। किसी व्यक्ति के कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स और उसकी बातचीत की असली ऑडियो रिकॉर्डिंग (Actual Audio Recording) अलग चीजें हैं। इसलिए 'कॉल रिकॉर्ड मिला' सुनकर यह मान लेना कि पुलिस के पास पूरी बातचीत मौजूद है, जरूरी नहीं।
आज के समय में मोबाइल डिजिटल इन्वेस्टिगेशन (Digital Investigation) का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। किसी मामले में लोकेशन से जुड़ा उपलब्ध डेटा (Available Data) घटनाक्रम की टाइमलाइन समझने में मदद कर सकता है। उदाहरण के तौर पर जांचकर्ता यह देखने की कोशिश कर सकते हैं कि किसी समय फोन किस जगह या किस क्षेत्र में मौजूद था। लेकिन यहां भी यह समझना जरूरी है कि फोन की लोकेशन और व्यक्ति की सटीक फिजिकल लोकेशन (Exact Physical Location) हमेशा एक ही चीज नहीं होती। फोन किसी दूसरे व्यक्ति के पास हो सकता है, कहीं रखा हो सकता है या लोकेशन डेटा की एक्युरेसी (Accuracy) अलग-अलग परिस्थितियों में बदल सकती है। इसलिए लोकेशन को भी आमतौर पर दूसरे सबूत के साथ देखा जाना ज्यादा सही है।
लेकिन किसी खास केस में इनमें से क्या उपलब्ध है और पुलिस ने क्या हासिल किया है, यह जांच पर निर्भर करता है। इसलिए किसी मामले में सिर्फ अनुमान लगाकर यह कहना सही नहीं होगा कि 'पुलिस को फोन से ये-ये चीजें जरूर मिल गई होंगी।'
सिर्फ फोन से किसी चीज को डिजिट कर देना और उसके हर संभावित डिजिटल ट्रैक का खत्म हो जाना एक ही बात नहीं है। डिजिटल डेटा कई जगहों पर अलग-अलग रूप में मौजूद हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर डिजिट मैसेज (Deleted Message) या फोटो को पुलिस निश्चित रूप से वापस निकाल लेगी। यह डिवाइस, ऐप, बैकअप, उपलब्ध डेटा, टेक्निकल प्रॉसेस और कई दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर कर सकता है।
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