
Rahul Gandhi New Team: 2029 के लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राहुल गांधी ने अभी से अपनी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। सालों की हिचकिचाहट, अंदरूनी गुटबाजी और पुराने-नए नेताओं की खींचतान के बाद अब राहुल बिल्कुल साफ संदेश दे रहे हैं-टीम वही बनेगी, जिस पर उन्हें खुद भरोसा होगा और जो उनके राजनीतिक ढर्रे पर काम कर सके। हाल ही में पार्टी सचिवों के पदों के लिए दो दिन तक चले इंटरव्यू इसका सबसे बड़ा सबूत हैं। राहुल ने खुद उन उम्मीदवारों से बातचीत की जिन्हें राष्ट्रीय महासचिवों और वरिष्ठ नेताओं की ओर से प्रस्तावित किया गया था। खबरें तो यहाँ तक हैं कि बड़े नेताओं द्वारा अनुशंसित कई नामों को राहुल ने सीधे खारिज कर दिया। संदेश साफ था: अब 'सिफारिश' के दम पर संगठन में पद नहीं मिलेंगे, चुनाव जिताने और आक्रामक राजनीति करने की काबिलियत ही एकमात्र पैमाना होगी।
कांग्रेस के अंदर राहुल गांधी की नई टीम बनाने की यह कवायद नई नहीं है। सालों तक उन्हें इसके लिए पार्टी के अंदर ही कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। एक दौर में G23 गुट के पुराने क्षत्रप उनके फैसलों पर सवाल उठाते रहे, तो शुरुआती दिनों में खुद सोनिया गांधी का मानना था कि राहुल को पार्टी में संतुलन बनाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। राहुल गांधी अब कांग्रेस संगठन को सीधे तौर पर अपने हिसाब से ढाल रहे हैं। अब वे वरिष्ठ नेताओं के दबाव में आकर फैसले लेने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखते।
हालिया संगठनात्मक बदलावों पर नजर डालें तो राहुल की सोच की झलक साफ दिखती है। पंजाब जैसे अहम राज्य का प्रभार सचिन पायलट को सौंपना मामूली फैसला नहीं है। पंजाब में कांग्रेस को लगता है कि वह वापस सत्ता में आ सकती है, लेकिन राज्य इकाई के अंदरूनी झगड़े हर बार बने-बनाये खेल को बिगाड़ देते हैं। पहले भूपेश बघेल पर राज्य प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग का पक्ष लेने के आरोप लगे, जिससे गुटीय तनाव और बढ़ गया था। ऐसे में अपनी पसंद के युवा और आक्रामक नेता सचिन पायलट को कमान सौंपकर राहुल ने अशोक गहलोत जैसे पुराने दिग्गज नेताओं को भी संदेश दे दिया है कि वे अपनी राजनीतिक पसंद के साथ खड़े रहने से पीछे नहीं हटेंगे।
गुजरात में बीजेपी के किले को ढहाना हमेशा से कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने भविष्यवाणी की थी कि बीजेपी गुजरात हारेगी, लेकिन अब तक जमीनी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। बंद कमरों की बैठकों में राहुल ने गुजरात के पिछले प्रभारियों के ढीले-ढाले रवैये और आक्रामकता की कमी पर साफ नाराजगी जताई थी। यही वजह है कि उन्होंने गुजरात का प्रभार रणदीप सुरजेवाला को सौंपा है। सुरजेवाला को बीजेपी से सीधे टकराने और मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के लिए जाना जाता है। राहुल को लगता है कि प्रधानमंत्री के गृह राज्य में ऐसा ही आक्रामक रुख काम आ सकता है।
ये बदलाव सिर्फ दो राज्यों तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। आने वाले दिनों में संगठन में कई और अहम नियुक्तियाँ देखने को मिल सकती हैं। मणिक्कम टैगोर और यूथ कांग्रेस में काम कर चुके श्रीनिवास बीवी (जिन्हें कांग्रेस सेवा दल की बड़ी जिम्मेदारी दी गई है) जैसे चेहरे यह साफ बताते हैं कि अब वफादारी और काम करने की क्षमता ही राहुल की नई टीम का आधार है। सालों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार राहुल गांधी अपनी शर्तों पर पार्टी की कमान संभालते दिख रहे हैं। भारतीय राजनीति का चक्र घूमकर फिर वहीं आ चुका है, लेकिन इस बार राहुल गांधी यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि 2029 की बड़ी लड़ाई में उनके पीछे कोई अंदरूनी अड़ंगा लगाने वाला न हो, बल्कि उनकी अपनी वफादार और आक्रामक टीम खड़ी हो।
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