रोहित एक्ट क्या है? UGC इक्विटी नियमों पर स्टे के बाद भी छात्र क्यों कर रहे विरोध?

Published : Jan 30, 2026, 09:37 AM IST

Explainer: SC ने UGC Equity Rules पर रोक लगा दी, लेकिन JNU-DU के छात्र अब भी सड़कों पर क्यों हैं? जानिए रोहित एक्ट क्या है, इसकी मांग क्यों तेज हुई और छात्रों की नाराज़गी की असली वजह। आईए विस्तार से इसके बारे में जानते हैं… 

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UGC Equity Rules: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में UGC के इक्विटी नियमों पर रोक लगा दी। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में जाति, लिंग और विकलांगता-आधारित भेदभाव को रोकना था, लेकिन इसके बावजूद JNU और DU जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में छात्र लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सवाल उठता है-जब कोर्ट ने स्टे दे दिया, तो फिर छात्र क्यों नहीं माने? छात्रों का कहना है कि समस्या सिर्फ नियमों की नहीं, बल्कि कैंपस में गहराई तक फैले भेदभाव की है।

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‘रोहित एक्ट’ क्या है और इसकी मांग क्यों हो रही है?

रोहित एक्ट कोई लागू कानून नहीं, बल्कि एक प्रस्तावित केंद्रीय कानून है। इसका मकसद है-उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, पहचान, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना। इस एक्ट का नाम 2016 में जान गंवाने वाले दलित छात्र रोहित वेमुला के नाम पर रखा गया है, जिनकी मौत ने पूरे देश में कैंपस डिस्क्रिमिनेशन पर बहस छेड़ दी थी।

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JNU-DU में विरोध क्यों तेज हुआ?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ ही घंटों बाद JNU और DU में छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया। पुतले जलाए गए, नारे लगे और मांग साफ थी-UGC इक्विटी नियमों को रोका नहीं जाए, बल्कि और मजबूत किया जाए। JNUSU और AISA जैसे छात्र संगठनों का कहना है कि नियमों पर रोक लगाने से भेदभाव की शिकायतें और दब जाएंगी।

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क्या सिर्फ कोर्ट का फैसला काफी है?

छात्रों और शिक्षकों का मानना है कि कानूनी रोक समस्या का हल नहीं है। JNUTA ने भी कहा कि मौजूदा नियम जाति और पहचान आधारित असमानता की जड़ों तक नहीं पहुंचते। छात्रों की मांग है कि रोहित एक्ट जैसे सख्त कानून लाकर कैंपस में जवाबदेही तय की जाए।

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रोहित वेमुला का मामला आज भी क्यों ज़िंदा है?

रोहित वेमुला की मौत सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है, जहां हाशिए पर खड़े छात्रों को बराबरी का मौका नहीं मिलता। यही वजह है कि आज भी छात्र उनका नाम लेकर न्याय और समानता की मांग कर रहे हैं।

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असली लड़ाई किस बात की है?

यह लड़ाई सिर्फ UGC नियमों या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो कैंपस में भेदभाव को सामान्य मान लेती है। छात्र चाहते हैं कि शिक्षा के मंदिरों में बराबरी सिर्फ किताबों में नहीं, हकीकत में भी दिखे।

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