
Gujarat Child Reunion Story: फिल्मों में दिखाई जाने वाली कहानियां अक्सर हमें भावुक कर देती हैं, लेकिन जब ऐसी ही कोई कहानी असल जिंदगी में सामने आती है तो उसका असर कहीं ज्यादा गहरा होता है। मध्य प्रदेश के सागर जिले से सामने आई एक ऐसी ही कहानी इन दिनों लोगों की आंखें नम कर रही है।
करीब तीन साल पहले एक मूक-बधिर बच्चा अपने परिवार से बिछड़ गया था। न वह बोल सकता था, न सुन सकता था और न ही उसे अपने घर का पता बताने का कोई तरीका आता था। लेकिन उम्मीद, धैर्य और मानवीय संवेदनाओं की बदौलत अब वह बच्चा अपने असली माता-पिता से मिलने जा रहा है। इस पूरे मिशन की सबसे बड़ी नायिका बनीं घरौंदा आश्रम की संचालिका प्रीति यादव, जिन्होंने हार मानने के बजाय लगातार प्रयास जारी रखे।
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जानकारी के अनुसार वर्ष 2019-20 के आसपास लगभग 12 साल का एक मूक-बधिर बच्चा अकेला भटकते हुए नीमच रेलवे स्टेशन पहुंच गया था। उसके पास कोई पहचान पत्र नहीं था और वह अपनी पहचान भी नहीं बता सकता था। बाल कल्याण समिति ने प्रारंभिक जांच और प्रयासों के बाद बच्चे को सागर स्थित घरौंदा आश्रम भेज दिया, ताकि उसकी देखभाल की जा सके। आश्रम में उसे नया नाम ‘वीरेंद्र उर्फ राम’ दिया गया।
इस दौरान पुलिस रिकॉर्ड खंगाले गए, फिंगरप्रिंट मिलान की कोशिश हुई और विभिन्न राज्यों में जानकारी भेजी गई, लेकिन बच्चे की पहचान से जुड़ा कोई सुराग नहीं मिला। हैरानी की बात यह रही कि किसी भी पुलिस थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं थी।
लगातार असफलताओं के बावजूद आश्रम संचालिका प्रीति यादव ने उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने बच्चे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं, विभिन्न जिलों और शहरों में लेकर गईं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। इसके बाद उन्होंने एक अलग तरीका अपनाया। वह बच्चे को लैपटॉप पर देश के विभिन्न शहरों, धार्मिक स्थलों, मंदिरों और मस्जिदों की तस्वीरें दिखाने लगीं। महीनों तक यह प्रयास जारी रहा। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी कहानी बदल दी।
लैपटॉप स्क्रीन पर एक मस्जिद की तस्वीर देखते ही बच्चा अचानक उत्साहित हो उठा। उसने अपने इशारों और हावभाव के जरिए संकेत दिया कि यह वही जगह है, जो उसके घर के पास स्थित है। प्रीति यादव ने इस संकेत को गंभीरता से लिया और उस मस्जिद से जुड़े लोगों तथा स्थानीय कमेटी से संपर्क साधना शुरू किया। बच्चे की तस्वीरें वहां भेजी गईं और धीरे-धीरे यह जानकारी सोशल मीडिया और स्थानीय नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ती चली गई।
तस्वीरें आखिरकार गुजरात के आनंद जिले के एक गांव तक पहुंचीं। वहां रहने वाले एक मजदूर परिवार ने फोटो देखते ही बच्चे को पहचान लिया। परिवार ने बताया कि यह उनका बेटा ‘कबीर राइन’ है, जो करीब तीन साल पहले अचानक लापता हो गया था। आर्थिक रूप से कमजोर होने और जानकारी के अभाव के कारण वे उसके गायब होने की औपचारिक शिकायत भी दर्ज नहीं करा पाए थे। अपने बेटे की तस्वीर देखकर परिवार की आंखों से आंसू छलक पड़े। वर्षों की प्रतीक्षा आखिरकार समाप्त होने जा रही थी।
सभी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद वीडियो कॉल के माध्यम से कबीर और उसके माता-पिता को आमने-सामने लाया गया। यह पल बेहद भावुक था। तीन साल बाद एक परिवार अपने खोए हुए बेटे को देख रहा था। दोनों ओर शब्द नहीं थे, लेकिन आंखों से बहते आंसू उस मिलन की कहानी बयां कर रहे थे जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। अब कबीर जल्द ही सागर से अपने घर गुजरात के आनंद जिले के लिए रवाना होगा।
घरौंदा आश्रम की संचालिका प्रीति यादव का कहना है कि बच्चे की आंखों में हमेशा अपने परिवार से मिलने की उम्मीद दिखाई देती थी। उन्होंने बताया कि जब बच्चे ने मस्जिद की तस्वीर पर प्रतिक्रिया दी, तभी उन्हें विश्वास हो गया था कि अब मंजिल दूर नहीं है। तीन साल तक लगातार प्रयास करना, नए-नए तरीके अपनाना और हार न मानना ही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है।
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