दुनिया में इतना सारा पानी समुद्र में है, लेकिन हम उसे पी नहीं सकते. आखिर समुद्र का पानी खारा और नदियों का पानी मीठा क्यों होता है? इसके पीछे एक दिलचस्प वैज्ञानिक कारण है, जो लाखों सालों से चल रहा है. आइए जानते हैं.
बारिश का पानी पूरी तरह शुद्ध नहीं होता. यह वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, जिससे यह थोड़ा एसिडिक हो जाता है. जब यह पानी चट्टानों पर पड़ता है, तो उन्हें धीरे-धीरे घोलता है. वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को 'रॉक वेदरिंग' कहते हैं. इससे चट्टानों से सोडियम और क्लोराइड जैसे मिनरल पानी में घुल जाते हैं और नदियों के रास्ते समुद्र तक पहुंच जाते हैं.
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हर साल नदियां थोड़ी मात्रा में नमक समुद्र में मिलाती हैं. एक साल में यह मात्रा बहुत कम लगती है, लेकिन यह प्रक्रिया अरबों सालों से चल रही है. समय के साथ यह नमक समुद्र में जमा होता गया. समुद्र एक बड़े स्टोर की तरह काम करता है, जिससे इसका खारापन लगातार बढ़ता गया. तस्वीर में जपावती नदी (Japavathi River) है.
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नदियों के पानी में भी थोड़ा नमक होता है, लेकिन नदियां लगातार बहती रहती हैं. वे पानी को जमा नहीं करतीं, इसलिए नमक जमा नहीं हो पाता. वहीं, समुद्र आखिरी मंजिल है, जहां सारा नमक पहुंचता है. जब समुद्र का पानी भाप बनता है, तो सिर्फ पानी ऊपर उठता है, नमक वहीं रह जाता है. इसी वजह से समुद्र का खारापन बढ़ता गया और नदियों का पानी मीठा बना रहा.
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सूरज की गर्मी से समुद्र का पानी भाप बनकर बादल बनाता है, जो फिर बारिश के रूप में धरती पर गिरता है. इस वॉटर साइकिल में एक खास बात है. भाप सिर्फ पानी की बनती है, जबकि नमक और मिनरल्स समुद्र में ही रह जाते हैं. लाखों सालों से यह प्रक्रिया दोहराई जा रही है, जिससे समुद्र में नमक की मात्रा बढ़ती गई.
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औसतन, समुद्र के पानी में खारापन करीब 3.5% होता है. इसका मतलब है कि एक किलोग्राम समुद्री पानी में लगभग 35 ग्राम घुला हुआ नमक होता है. यही वजह है कि समुद्र का पानी पीने लायक नहीं होता. यह प्रकृति और भौगोलिक चक्रों का नतीजा है, जो लाखों सालों में बना है.
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