लड़कियों को स्कूलों में फ्री सैनिटरी पैड जरूरी, नहीं दिए तो मान्यता रद्द: सुप्रीम कोर्ट

Published : Jan 30, 2026, 04:32 PM IST

Free Sanitary Pads in Schools  : सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त  सैनिटरी पैड और लड़के-लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट अनिवार्य किए। जानिए कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार क्यों बताया और नियम न मानने पर क्या कार्रवाई होगी।

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स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

देशभर में लाखों छात्राओं की रोजमर्रा की जरूरतों और सम्मान से जुड़ा एक अहम मुद्दा अब संवैधानिक स्तर पर मजबूती से उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय तथा दिव्यांगों के लिए अनुकूल टॉयलेट होना अनिवार्य है।

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मासिक धर्म स्वास्थ्य को बताया मौलिक अधिकार का हिस्सा

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने अपने अहम निर्देश में कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य, संविधान के तहत दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट का मानना है कि यदि छात्राओं को स्कूल में सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक माहौल नहीं मिलता, तो यह उनके शिक्षा के अधिकार और गरिमा दोनों का उल्लंघन है।

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नियम न मानने पर स्कूलों की मान्यता पर खतरा

शीर्ष अदालत ने निजी स्कूलों को सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई निजी स्कूल छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने और लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट सुनिश्चित करने में विफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। यह निर्देश स्कूल प्रबंधन को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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सरकारों पर भी तय होगी जिम्मेदारी

कोर्ट ने सिर्फ निजी स्कूलों तक ही सख्ती सीमित नहीं रखी। पीठ ने कहा कि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में भी यदि छात्राओं को जरूरी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं, तो संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि स्कूल चाहे सरकार द्वारा संचालित हों या उसके नियंत्रण में, सभी में दिव्यांगों के लिए उपयुक्त शौचालय अनिवार्य रूप से होने चाहिए।

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अलग-अलग टॉयलेट अनिवार्य करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय हों। कोर्ट का मानना है कि यह न केवल स्वच्छता का सवाल है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, निजता और गरिमा से भी सीधे जुड़ा हुआ विषय है।

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जनहित याचिका से आया ऐतिहासिक फैसला

यह फैसला 10 दिसंबर 2024 को जया ठाकुर की ओर से दाखिल एक जनहित याचिका के बाद आया है। याचिका में मांग की गई थी कि कक्षा 6 से 12 तक की किशोर छात्राओं के लिए केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे देश में लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा था, जो अब छात्राओं के हक में एक मजबूत संदेश के रूप में सामने आया है।

इस आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। सुरक्षित माहौल, स्वास्थ्य सुविधाएं और गरिमापूर्ण व्यवहार भी शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। छात्राओं के लिए मुफ्त सैनिटरी पैड और सुरक्षित शौचालय की व्यवस्था, न केवल स्कूल छोड़ने की समस्या को कम करेगी, बल्कि लड़कियों को आत्मविश्वास के साथ पढ़ाई जारी रखने का अवसर भी देगी।

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