
नई दिल्ली: देश की सड़कों पर दौड़ती आधी से ज्यादा गाड़ियों के पास वैध इंश्योरेंस नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरा आश्चर्य जताया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने सड़क सुरक्षा और दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों को संविधान के आर्टिकल 21 ('जीवन के अधिकार') से जोड़ते हुए 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' (बिना इंश्योरेंस, बिना फ्यूल) पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का बड़ा फैसला सुनाया है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश की करीब 30 करोड़ गाड़ियों में से 56% (लगभग 16.54 करोड़) बिना वैलिड इंश्योरेंस के चल रही हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिए कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) और IRDAI को सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं:
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2018 में दिए गए तीन और पांच साल के नियमों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने नई गाड़ियों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी मोटर इंश्योरेंस की अवधि को एक-एक साल और बढ़ा दिया है। अब नई कारों के लिए यह अवधि चार साल और दो-पहिया वाहनों के लिए छह साल अनिवार्य होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि पेट्रोल पंपों पर ऐसा डिजिटल सिस्टम विकसित किया जाए, जो वाहन का इंश्योरेंस स्टेटस VAHAN पोर्टल और इंश्योरेंस डेटाबेस से जांच सके। यदि इंश्योरेंस वैध नहीं हो, तो वाहन में ईंधन न दिया जाए। अदालत ने ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को भी इंश्योरेंस डेटाबेस से जोड़ने और पुलिस को मौके पर ही इंश्योरेंस सत्यापित करने के लिए डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराने की बात कही।
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर इंश्योरेंस को आसान बनाने के लिए चार-स्तरीय सिस्टम (अनिवार्य थर्ड-पार्टी, वैकल्पिक पैसेंजर कवर, पर्सनल एक्सीडेंट कवर और ऑन-डैमेज कवर) का समर्थन किया है। तेलंगाना हाई कोर्ट के 10 लाख रुपये से अधिक के मुआवजा फैसले को बरकरार रखते हुए, कोर्ट ने सभी संबंधित एजेंसियों को 14 अगस्त तक कंप्लायंस रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।
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