Viral Video: 23 साल से मृत बेटे की ‘शादी’ क्यों करा रहे माता-पिता? इस अनोखी कहानी ने चौंकाया

Published : Mar 28, 2026, 02:33 PM ISTUpdated : Mar 28, 2026, 02:46 PM IST

Ram Koti Mystery Story: क्या मौत के बाद भी शादी संभव है? तेलंगाना में 23 साल से एक परिवार अपने मृत बेटे की हर साल शादी कर रहा है। सपने, प्रेम और परंपरा का ये अनोखा संगम अब पूरे गांव की आस्था बन चुका है।

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Dead Son Marriage Ritual: तेलंगाना से एक ऐसी दिल छू लेने वाली और रहस्यमयी कहानी सामने आई है, जिसने लोगों को भावुक भी किया है और सोचने पर भी मजबूर कर दिया है। Mahabubabad जिले में रहने वाले एक दंपति पिछले 23 सालों से हर साल अपने मृत बेटे की शादी की रस्म निभा रहे हैं। यह कहानी है लालू और सुक्कम्मा की, जिन्होंने अपने बेटे राम कोटी को 2003 में खो दिया था। लेकिन बेटे की याद को खत्म होने देने के बजाय, उन्होंने उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखने का एक अनोखा रास्ता चुना। सवाल उठता है क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या बेटे के प्यार और दर्द को जिंदा रखने का तरीका?

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क्या है इस ‘मृत बेटे की शादी’ की पूरी कहानी?

राम कोटी एक लड़की से प्यार करता था, लेकिन परिवार के विरोध के कारण दोनों की शादी नहीं हो पाई। इस दर्द को सहन न कर पाने के कारण उसने आत्महत्या कर ली। कुछ ही समय बाद, उस लड़की ने भी अपनी जान दे दी। यह घटना दोनों परिवारों के लिए बहुत बड़ा सदमा थी। माता-पिता पूरी तरह टूट गए थे, लेकिन यहीं से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन चुकी है।

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क्या सच में सपने ने बदली इस परिवार की ज़िंदगी?

सुक्कम्मा के मुताबिक, बेटे की मौत के बाद वह उनके सपने में आया और उनसे मंदिर बनवाने और उसकी शादी की रस्म पूरी करने की इच्छा जताई। इस विश्वास को सच मानते हुए, परिवार ने अपने घर में एक छोटा सा मंदिर बनवाया। उन्होंने अपने बेटे और उसकी प्रेमिका की मूर्तियां स्थापित कीं और उन्हें एक साथ रखा। यहीं से हर साल होने वाली इस अनोखी शादी की परंपरा शुरू हुई।

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हर साल राम नवमी पर क्यों होती है ये शादी?

Ram Navami के दिन इस रस्म को निभाया जाता है, जो भगवान राम और माता सीता के विवाह का पावन दिन माना जाता है। इसी परंपरा से प्रेरित होकर, यह परिवार अपने बेटे और उसकी प्रेमिका को भगवान का रूप मानकर उनकी शादी कराता है। पूरी रस्म बिल्कुल एक असली शादी की तरह होती है-पूजा, मंत्र, प्रसाद और सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ। यह सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव बन चुका है।

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क्या अब यह निजी दर्द एक सार्वजनिक परंपरा बन गया है?

जो सिलसिला पहले सिर्फ एक परिवार तक सीमित था, वह अब एक बड़े सामूहिक आयोजन में बदल चुका है। Mahabubabad और आसपास के गांवों से लोग हर साल इस रस्म में शामिल होने आते हैं। गांव वाले इसे आस्था और प्रेम का प्रतीक मानते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि सच्चे प्यार और यादों को जिंदा रखने का तरीका है।

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क्या यह परंपरा भावनात्मक सहारा है या एक गहरी पीड़ा का संकेत?

यह कहानी जितनी भावुक है, उतनी ही गंभीर भी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में परिवार अपने दुख से निपटने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। यह परंपरा भी उसी का एक रूप हो सकती है।हालांकि, यह घटना हमें मानसिक स्वास्थ्य के महत्व की भी याद दिलाती है। अगर किसी को भावनात्मक या मानसिक परेशानी हो, तो समय पर मदद लेना बेहद जरूरी है। तेलंगाना की यह कहानी दिखाती है कि सच्चा प्यार और अपनेपन की भावना समय के साथ खत्म नहीं होती। लालू और सुक्कम्मा ने अपने बेटे को खोने के बाद भी उसे अपनी जिंदगी में जिंदा रखा है-एक अनोखी परंपरा के जरिए।

  • जरूरी जानकारी (Mental Health Support):
  • अगर आप या आपका कोई जानने वाला भावनात्मक तनाव से गुजर रहा है, तो मदद जरूर लें।
  • वंद्रेवाला फाउंडेशन: 9999666555
  • TISS iCALL: 022-25521111 (सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक)।

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