
TMC Controversy: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों तक एकछत्र राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) आज अपने इतिहास के सबसे गंभीर दौर से गुजर रही है। कभी 'मां, माटी, मानुष' के नारे से वामपंथ के अभेद्य किले को ढहाने वाली ममता बनर्जी की पार्टी आज खुद अंदरूनी जंग और बिखराव के मुहाने पर खड़ी है। यह कमजोरी किसी बाहरी राजनीतिक विरोधी की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अपने ही स्तंभों के दरकने के कारण पैदा हुई है। वरिष्ठ नेताओं के बीच सार्वजनिक मंचों पर हो रही तीखी बहस और इस्तीफों की झड़ी ने यह साफ कर दिया है कि तृणमूल का अंदरूनी ढांचा भीतर से खोखला हो चुका है।
पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रही असंतोष की आग अब पूरी तरह भड़क चुकी है। लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार और कल्याण बनर्जी के बीच सार्वजनिक रूप से हुई तीखी तकरार ने पार्टी के अनुशासन की धज्जियां उड़ा दी हैं। दस्तीदार और उनके पति सुदर्शन घोष दस्तीदार, जो आंदोलन के दिनों से ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, उनका अचानक बागी रुख अख्तियार करना टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका है। बात यहीं नहीं रुकी; दस्तीदार की खुली असहमति के कुछ ही घंटों बाद एक और कद्दावर नेता शांतनु सेन ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। जब सालों पुराने लॉयल नेटवर्क के सबसे भरोसेमंद चेहरे ही बगावत पर उतर आएं, तो यह साफ है कि संकट केवल गुटबाजी का नहीं, बल्कि साख और भरोसे का है।
पार्टी के इस बिखराव के पीछे एक समानांतर सत्ता केंद्र का उभरना सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद और संगठनात्मक फैसलों में उनकी मजबूत पकड़ ने पुराने और अनुभवी नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। I-PAC और डेटा की राजनीति: अनुभवी नेताओं का आरोप है कि आंदोलन से उपजे संगठन को अब कॉर्पोरेट रणनीतिकार, डेटा ऑपरेटर और 'प्रेजेंटेशन की राजनीति' चलाने वाले लोग नियंत्रित कर रहे हैं। पुराने वफादारों की उपेक्षा: मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी और दिनेश त्रिवेदी जैसे कद्दावर नेताओं के जाने के बाद भी पार्टी ने सबक नहीं सीखा। जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं की जगह ग्लैमरस चेहरों और सोशल मीडिया स्टार्स को तरजीह दी जाने लगी, जिसने जमीनी कैडर को पूरी तरह निराश कर दिया।
सूत्रों के मुताबिक, कम से कम 11 वरिष्ठ नेता—जिनमें चार सांसद और तीन पूर्व मंत्री शामिल हैं—अब राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। कुछ नेताओं के दूसरे राजनीतिक खेमों से संपर्क की खबरें भी सामने आ रही हैं। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब पार्टी को हालिया चुनावी झटकों के बाद अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है। विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी वैचारिक संरचना रही है। पार्टी का संगठन लंबे समय तक सत्ता, प्रभाव और स्थानीय नेटवर्क पर टिका रहा। जब तक जीत मिलती रही, यह मॉडल चलता रहा। लेकिन जैसे ही हार और असंतोष सामने आया, वही ढांचा बिखरता दिखाई देने लगा।
पार्टी के भीतर से आ रही खबरें बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली हैं। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि कम से कम 11 और वरिष्ठ नेता, जिनमें 4 मौजूदा सांसद और 3 पूर्व मंत्री शामिल हैं, बहुत जल्द पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं। इनमें से कई नेता सत्ताधारी खेमे के साथ बैकचैनल बातचीत कर रहे हैं, तो कुछ सिर्फ सही राजनीतिक मौके के इंतजार में खुद को संगठन से दूर कर चुके हैं। हालिया चुनावी झटकों के बाद ममता बनर्जी के 'अजेय' होने का जो तिलस्म था, वह टूट चुका है। विचारधारा के अभाव और सिर्फ सत्ता के संरक्षण पर टिकी इस पार्टी के नेता अब खुद को सुरक्षित करने के लिए नए ठिकाने तलाश रहे हैं। क्या दीदी अपनी बिखरती हुई इस 'गुटों की फैक्ट्री' को दोबारा एकजुट कर पाएंगी, या फिर 2026 के बाद शुरू हुआ यह मंथन तृणमूल कांग्रेस के अंत की शुरुआत है? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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