
TMC Rebel Group Secret Plan: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर लग रहा है कि कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पहले TMC विधायकों की बगावत, फिर सांसदों का अलग रास्ता और अब बागी गुट ने अब एक ऐसा 'मास्टरप्लान' तैयार किया है, जो बगाल की नगरपालिकाओं से लेकर गांवों की जिला परिषदों तक TMC का कंट्रोल पूरी तरह खत्म कर सकता है। यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर चल रहा सियासी घमासान लगातार बड़ा होता जा रहा है। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के बयानों ने संकेत दिए हैं कि उनका मकसद सिर्फ कुछ विधायक या सांसद अपने साथ जोड़ना नहीं है। उनकी नजर अब बंगाल के उस राजनीतिक ढांचे पर है, जहां से जमीनी ताकत निकलती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ बगावत है या फिर टीएमसी के अंदर सबसे बड़े टेकओवर प्लान की शुरुआत है? आइए जानते हैं कि बंगाल की राजनीति में पर्दे के पीछे आखिर क्या खिचड़ी पक रही है...
हाल ही में कोलकाता के पूर्व मेयर और कद्दावर नेता फिरहाद हकीम मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कोलकाता नगर निगम में हुई मीटिंग से सीधे विधानसभा पहुंचे। उनके साथ बागी गुट के संदीपन साहा और कुणाल घोष भी दिखाई दिए। सभी नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के केबिन में गए, जहां पहले से ही बागी विधायकों का जमावड़ा था। इस सीक्रेट मीटिंग के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने मीडिया के सामने आकर कहा, 'आज एक और विधायक ने हमारे समर्थन में दस्तखत कर दिए हैं और अब हमारे साथ 65 विधायक हैं।' हालांकि उन्होंने यह राज नहीं खोला कि वो नया चेहरा फिरहाद हकीम ही हैं या कोई और। बागी गुट का दावा है कि कुल 80 विधायकों में से यह आंकड़ा बहुत जल्द 68 तक पहुंच सकता है।
अब तक माना जा रहा था कि टीएमसी बागी गुट की लड़ाई सिर्फ विधानसभा और लोकसभा तक सीमित है, लेकिन हालिया संकेत कुछ और कहानी बता रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि उनकी पहली प्राथमिकता विधायक थे, फिर सांसद। अब अगला फोकस नगर निगम, नगरपालिकाएं और जिला परिषदें हैं। यानी आने वाले दिनों में बंगाल की स्थानीय राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को कई राजनीतिक जानकार लंबी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राजनीति सिर्फ विधानसभा और संसद से नहीं चलती। किसी भी पार्टी की असली ताकत उसके जमीनी संगठन में होती है। नगर निगम, नगरपालिका और जिला परिषद जैसे निकाय जनता से सीधे जुड़े होते हैं। यहीं से कार्यकर्ता तैयार होते हैं, स्थानीय नेतृत्व बनता है और चुनावी मशीनरी मजबूत होती है। अगर किसी गुट का इन संस्थाओं पर प्रभाव बढ़ता है, तो उसका असर सीधे अगले चुनावों पर भी पड़ सकता है।
ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि उनके साथ दो-तिहाई से ज्यादा विधायक और सांसद हैं। उनका दावा है कि जरूरत पड़ने पर वे चुनाव आयोग का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं। यानी आने वाले समय में असली और नकली टीएमसी की बहस भी तेज हो सकती है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही होगा। इस पूरे विवाद का एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है। बागी गुट का कहना है कि पश्चिम बंगाल में विधायक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे, जबकि दिल्ली में सांसद अलग राजनीतिक रणनीति अपना सकते हैं। यानी राज्य और केंद्र की राजनीति में एक ही गुट के अलग-अलग रुख देखने को मिल सकते हैं। यह स्थिति आने वाले दिनों में और ज्यादा दिलचस्प हो सकती है।
फिलहाल TMC नेतृत्व की ओर से इन दावों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लेकिन इतना तय है कि बागी गुट लगातार अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अगर नगर निगमों, नगरपालिकाओं और जिला परिषदों तक यह असर पहुंचता है, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक जानकार इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बगावत नहीं, बल्कि संगठन पर कंट्रोल की लड़ाई के तौर पर देख रहे हैं।
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