
Brent Crude Oil Price Drop: ग्लोबल एनर्जी मार्केट से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक ऐसी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है, जिसने पिछले कई महीनों की पूरी तेजी को पल भर में नेस्तनाबूद कर दिया है। पिछले सेशन में लगभग 5% की भारी गिरावट के बाद ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $83 प्रति बैरल के आसपास बंद हुआ था, लेकिन मंगलवार दोपहर होते-होते यह 1.7% और टूटकर $81.4 प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। वहीं दूसरी ओर, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी लुढ़ककर $78 के बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया। फारस की खाड़ी में महीनों से जारी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में जो बारूदी उबाल आया था, वह अब पूरी तरह शांत होता नजर आ रहा है।
कच्चे तेल के दामों में आई इस अचानक गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली संभावित 'शांति डील' है। ग्लोबल ट्रेडर्स और बड़े निवेशक इस वक्त स्विट्जरलैंड की धरती पर होने जा रही वाशिंगटन और तेहरान की मुलाकात पर नजरें गड़ाए बैठे हैं, जहां इस सप्ताह के अंत में एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। हालांकि, बाजार में राहत के साथ-साथ एक गहरा सस्पेंस भी बना हुआ है। ट्रेडर्स बेहद सतर्क हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी प्रशासन, दोनों में से किसी ने भी अब तक इस प्रस्तावित समझौता ज्ञापन (MoU) के मुख्य नियमों और शर्तों का विवरण सार्वजनिक नहीं किया है।
फ्रांस में चल रहे G7 शिखर सम्मेलन के मंच से बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा दावा करके सबको चौंका दिया है। ट्रंप ने कहा कि आगामी शुक्रवार तक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को "पूरी तरह से खुला और टोल-फ्री" कर दिया जाएगा। आपको बता दें कि इस महासंकट से पहले दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां (20%) हिस्सा इसी बेहद संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता था। हाल के महीनों में इसके बंद होने से क्रूड, पेट्रोलियम ईंधन और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की वैश्विक शिपमेंट पूरी तरह ठप हो गई थी, जिसके कारण भारत सहित कई देशों को अपने इमरजेंसी रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserves) का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ा था।
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप शुक्रवार को इस रूट को खोलने का दम भर रहे हों, लेकिन एनर्जी एनालिस्ट्स ने एक बड़ी और डरावनी चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते पर दस्तखत होने के बाद भी तेल का प्रवाह तुरंत सामान्य नहीं हो पाएगा। शिपिंग इंटेलिजेंस फर्म 'Kpler' के आंकड़ों ने इस कड़वी सच्चाई से पर्दा उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 300 कच्चे तेल और गैस से लदे भारी-भरकम कार्गो जहाज वर्तमान में फारस की खाड़ी से बाहर निकलने का इंतजार कर रहे हैं, जबकि ठीक इतनी ही संख्या (300) में खाली जहाज इस क्षेत्र में प्रवेश करने और सामान लोड करने के लिए समंदर में कतार लगाए खड़े हैं। यह विशालकाय लॉजिस्टिकल बैकलॉग अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।
जमीन पर इस समझौते को लागू करने से पहले कई ऐसे पेचीदा सवाल हैं जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है। दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियां, कमोडिटी ट्रेडर्स और एनर्जी खरीदार इस रास्ते पर अपने अरबों रुपये के जहाजों को उतारने से पहले ऑपरेशनल नियमों और पुख्ता सुरक्षा व्यवस्थाओं पर अधिक स्पष्टता चाहते हैं। सबसे बड़ा सस्पेंस इस बात को लेकर है कि क्या युद्ध क्षेत्र में जहाजों को मिलने वाला समुद्री सुरक्षा बीमा (Marine Insurance) और उसकी भारी-भरकम लागत कम होगी? इसके अलावा, शिपिंग गतिविधियों में बाधा डालने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की कागजी प्रक्रिया में कितना वक्त लगेगा? जब तक इन कूटनीतिक सवालों पर से पर्दा नहीं उठता, तब तक कच्चे तेल के बाजार में यह सस्पेंस और उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहेगा।
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