
वाशिंगटन / नई दिल्ली: अमेरिकी धरती पर करियर बनाने और बसने का सपना देखने वाले लाखों भारतीय प्रोफेशनल्स, छात्रों और उनके परिवारों के सिर पर अनिश्चितता की एक नई तलवार लटक गई है। ट्रंप प्रशासन ऐसे नए इमिग्रेशन नियमों की तैयारी कर रहा है, जो H-1B वीज़ा, ग्रीन कार्ड, स्टूडेंट वीज़ा और H-4 वीज़ा धारकों से जुड़े कई अहम प्रावधानों को पहले से अधिक सख्त बना सकते हैं। यदि इन प्रस्तावों को हरी झंडी मिलती है, तो अमेरिका की ओर देखने वाले भारतीयों के लिए लागत आसमान छू जाएगी, जांच-पड़ताल की दीवारें और ऊंची हो जाएंगी, तथा कानूनी पेचीदगियां कई गुना बढ़ जाएंगी। यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम का कायाकल्प है, जिसका सबसे सीधा और गहरा प्रहार भारतीय प्रवासी समूह पर होने वाला है।
यह कोई सामान्य अटकलबाजी नहीं है, बल्कि अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी (DHS), लेबर डिपार्टमेंट (DOL) और स्टेट डिपार्टमेंट (DOS) द्वारा जारी किए गए लेटेस्ट 'यूनिफाइड रेगुलेटरी एजेंडा' से निकला एक कड़वा सच है। हालांकि ये प्रस्ताव अभी पूरी तरह से कानून नहीं बने हैं, लेकिन इन्होंने प्रशासन की मंशा को पूरी तरह साफ कर दिया है। इस नए रोडमैप के तहत कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को हायर करना न केवल खर्चीला हो जाएगा, बल्कि इतनी कागज़ी कार्रवाई बढ़ा दी जाएगी कि कॉर्पोरेट घराने विदेशी प्रतिभाओं से दूरी बनाने पर मजबूर हो सकते हैं। चूंकि अमेरिकी टेक इंडस्ट्री, स्टूडेंट कम्युनिटी और ग्रीन कार्ड की कतारों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीयों की है, इसलिए इस 'चक्रव्यूह' में सबसे ज्यादा भारतीय ही फंसने वाले हैं।
प्रस्तावित बदलावों में सबसे अधिक चर्चा H-1B वीज़ा प्रोग्राम को लेकर हो रही है। यही वह वीज़ा है, जिसके जरिए हर साल हजारों भारतीय आईटी इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और अन्य विशेषज्ञ अमेरिकी कंपनियों में नौकरी हासिल करते हैं। अगर प्रस्ताव लागू होता है तो यूनिवर्सिटी और रिसर्च संस्थानों को मिलने वाली H-1B कैप छूट सीमित की जा सकती है। साथ ही उन कंपनियों पर भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी, जो H-1B कर्मचारियों को थर्ड-पार्टी क्लाइंट साइट्स पर तैनात करती हैं। कंपनियों को यह साबित करना पड़ सकता है कि कर्मचारी वास्तव में उनके नियंत्रण में काम कर रहा है और उसके रोजगार संबंध पूरी तरह वैध हैं।
सालाना सीमा के तहत मिलने वाले 85,000 H-1B वीज़ा के नियमों को अगस्त में पूरी तरह बदलने की तैयारी है। सबसे बड़ा हमला उस 'थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट मॉडल' पर होने जा रहा है, जिसके दम पर भारत की दिग्गज आईटी और कंसल्टिंग कंपनियां अमेरिका में अपना साम्राज्य चलाती हैं। नए नियमों के तहत, एम्प्लॉयर्स को अब यह साबित करने के लिए लोहे के चने चबाने होंगे कि कर्मचारी के साथ उनका वास्तविक 'एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई' रिश्ता है। उन्हें भारी-भरकम दस्तावेज़ों के ज़रिए यह पक्का सबूत देना होगा कि कर्मचारी क्लाइंट की साइट पर क्या खास काम करेगा। इतना ही नहीं, जिन कंपनियों का पहले नियमों के उल्लंघन का थोड़ा भी इतिहास रहा है, उनकी फाइलों को अब सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) के नीचे रखकर परखा जाएगा।
भारतीय आईटी और कंसल्टिंग कंपनियां लंबे समय से क्लाइंट साइट मॉडल पर काम करती रही हैं। प्रस्तावित नियमों के लागू होने पर उन्हें अतिरिक्त दस्तावेज़ जमा करने होंगे और हर नियुक्ति के लिए अधिक विस्तृत प्रमाण देने पड़ सकते हैं। जिन कंपनियों का पहले H-1B नियमों के उल्लंघन का रिकॉर्ड रहा है, उन्हें भविष्य में और अधिक जांच का सामना करना पड़ सकता है।
लागत बढ़ाने की इस योजना में एक और खतरनाक पेंच शामिल है। DHS उन एम्प्लॉयर्स पर लागू होने वाली सप्लीमेंटल फीस को बढ़ाने जा रहा है, जिनकी कुल वर्कफोर्स में 50 से अधिक कर्मचारी हैं और उनमें से आधे से ज्यादा H-1B या L-1 वीज़ा पर हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि यह भारी-भरकम फीस अब सिर्फ शुरुआती पिटीशन या एम्प्लॉयर बदलने पर नहीं, बल्कि वीज़ा एक्सटेंशन (बढ़ाने) के आवेदनों पर भी वसूल की जाएगी। इससे आउटसोर्सिंग पर निर्भर भारतीय टेक कंपनियों का बजट पूरी तरह चरमरा जाएगा और उनके लिए अमेरिका में टिके रहना वित्तीय रूप से घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
लेबर डिपार्टमेंट (DOL) ने विदेशी कर्मचारियों को रखने की न्यूनतम आर्थिक सीमा को इतना ऊंचा करने का मन बना लिया है कि कंपनियां चाहकर भी उन्हें स्पॉन्सर न कर सकें। PERM लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस में होने वाले बदलावों के तहत, एंट्री-लेवल का न्यूनतम वेतन 17वें परसेंटाइल से सीधे बढ़ाकर 34वें परसेंटाइल करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही, उच्च वेतन स्तरों में भी भारी बढ़ोतरी की जाएगी। नतीजा यह होगा कि अमेरिकी एम्प्लॉयर्स को विदेशी वर्करों को बहुत ज्यादा सैलरी देनी होगी। इस बढ़ती लागत, कड़े भेदभाव-विरोधी उपायों और ग्रीन कार्ड के अंतहीन बैकलॉग से तंग आकर अब कई शीर्ष भारतीय प्रोफेशनल्स अमेरिका का मोह छोड़कर एक सुरक्षित और निश्चित भविष्य की तलाश में यूनाइटेड किंगडम (UK) का रुख करने पर मजबूर हो रहे हैं।
2024-25 के शैक्षणिक वर्ष में करीब 3.6 लाख छात्रों को भेजने वाला भारत आज अमेरिकी विश्वविद्यालयों का सबसे बड़ा स्रोत है। लेकिन अब उनके लिए भी रास्ते बंद किए जा रहे हैं। DHS छात्रों के लिए पारंपरिक "ड्यूरेशन ऑफ़ स्टेटस" सिस्टम को खत्म करने जा रहा है। इसका मतलब है कि अब छात्र तब तक अमेरिका में नहीं रह पाएंगे जब तक उनका कोर्स चल रहा है, बल्कि उन्हें एक तय समयसीमा दी जाएगी। वह समय खत्म होते ही पढ़ाई जारी रखने के लिए बार-बार एक्सटेंशन की कठिन प्रक्रियाओं से गुज़रना होगा। इसके अलावा, फरवरी 2027 में आने वाला एक और प्रस्ताव 'ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग' (OPT) और CPT के नियमों को बेहद कड़ा कर देगा, जिससे पढ़ाई के बाद मिलने वाला दो साल का STEM OPT एक्सटेंशन खतरे में पड़ सकता है।
इस इमिग्रेशन संकट का सबसे दर्दनाक असर H-1B वर्करों के जीवनसाथियों (H-4 वीज़ा धारकों) पर पड़ने वाला है, जिनमें बहुसंख्यक भारतीय महिलाएं हैं। इसी महीने आने वाले एक अंतिम नियम के तहत, 'एम्प्लॉयमेंट ऑथराइज़ेशन डॉक्यूमेंट्स' (EADs) का ऑटोमैटिक एक्सटेंशन खत्म किया जा सकता है, जो अक्टूबर 2025 के एक अंतरिम नियम के तहत मिलता था। इसका सीधा असर यह होगा कि भले ही किसी H-4 धारक ने एक्सपायरी से 180 दिन पहले रिन्यूअल के लिए आवेदन कर दिया हो, लेकिन अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग (USCIS) की सुस्त प्रोसेसिंग के कारण वैध वर्क ऑथराइज़ेशन के अभाव में उन्हें अपनी चलती-चलाती नौकरियां गंवानी पड़ सकती हैं। फ्रैगोमेन इमिग्रेशन फर्म के अटॉर्नी मिच वेक्सलर के अनुसार, यह एजेंडा प्रशासन की प्राथमिकताओं का एक स्पष्ट "रोडमैप" है, जो आने वाले दिनों में विदेशी पेशेवरों के लिए अदालती लड़ाइयों और अनिश्चितता का एक लंबा दौर लेकर आने वाला है।
फिलहाल ये सभी बदलाव प्रस्तावित स्तर पर हैं। इन्हें लागू होने से पहले औपचारिक नियम-निर्माण प्रक्रिया, सार्वजनिक टिप्पणियां, अंतिम मंजूरी और संभावित कानूनी चुनौतियों से गुजरना होगा। इसलिए अभी इन्हें अंतिम नियम नहीं माना जा सकता।
भारत H-1B वीज़ा धारकों, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड आवेदकों और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत है। ऐसे में यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो सबसे अधिक प्रभाव भारतीय पेशेवरों, छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। बढ़ती लागत, सख्त जांच और लंबी प्रक्रियाएं अमेरिका में काम करने या बसने का सपना पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं। आने वाले महीनों में ट्रंप प्रशासन के अगले कदम पर दुनिया भर की नजरें टिकी रहेंगी।
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