
US Iran Conflict: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी ईरान में कई सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए हैं। CENTCOM के अनुसार, इन हमलों में कमांड सेंटर, एयर डिफेंस पोजीशन, मिसाइल और ड्रोन इंफ्रास्ट्रक्चर, तटीय निगरानी सुविधाओं तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रणनीतिक ग्रेटर टुनब द्वीप पर मौजूद सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह अभियान उन क्षमताओं को कमजोर करने के उद्देश्य से चलाया गया है जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा सकता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
CENTCOM के अनुसार, नवीनतम सैन्य अभियान 15 जुलाई की रात पूरा किया गया। अमेरिकी सेना का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान प्रिसीजन-गाइडेड हथियारों का इस्तेमाल किया गया और दक्षिणी ईरान के कई संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों को लक्ष्य बनाया गया। इनमें बंदर अब्बास के आसपास स्थित सैन्य ढांचे भी शामिल बताए गए हैं, जिसे ईरान का प्रमुख नौसैनिक केंद्र माना जाता है। अमेरिकी बयान के मुताबिक, ग्रेटर टुनब द्वीप पर तटीय रक्षा प्रणाली और कथित क्रूज़ मिसाइल ठिकानों के खिलाफ अलग कार्रवाई भी की गई।
According to a release from U.S, Central Command, at 9 pm eastern time, the latest wave of U.S. strikes against Iran, that included strikes on command centers, air defense sites, missile and drone capabilities, and coastal surveillance facilities, ended. Strikes are ongoing while… pic.twitter.com/0umnRw4V2T
— OSINTdefender (@sentdefender) July 16, 2026
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज़ जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका का कहना है कि हाल के अभियानों का उद्देश्य इस समुद्री मार्ग पर सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना और व्यावसायिक जहाजों के लिए संभावित खतरों को कम करना है। वहीं ईरान पहले भी अमेरिकी कार्रवाइयों की आलोचना करता रहा है और उन्हें क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला कदम बताता रहा है।
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ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा द्वीप लंबे समय से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच संप्रभुता विवाद का विषय रहे हैं। ईरान 1971 से इन द्वीपों पर नियंत्रण बनाए हुए है, जबकि UAE इन्हें अपना क्षेत्र मानता है और विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की मांग करता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन द्वीपों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री गतिविधियों पर रणनीतिक नजर रखी जा सकती है। यही कारण है कि इनका सैन्य और भू-राजनीतिक महत्व बेहद अधिक माना जाता है।
हाल के सैन्य अभियानों और क्षेत्रीय तनाव ने अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही जटिल कूटनीतिक स्थिति को और कठिन बना दिया है। दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और बढ़ते सैन्य कदम किसी संभावित समझौते की राह को और चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री परिवहन पर भी पड़ सकता है।
CENTCOM के दावों के बाद पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर टिक गई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान इस घटनाक्रम पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है और क्या आने वाले दिनों में सैन्य गतिविधियां और तेज होती हैं या फिर कूटनीतिक प्रयास तनाव कम करने में सफल होते हैं। फिलहाल होर्मुज़ जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है।
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