
US Iran 12 Point Agreement: US-ईरान के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी और मध्य पूर्व (Middle East) के सुलगते हालातों के बीच एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक अत्यंत गोपनीय '12-पॉइंट शांति समझौते' (MOU) का मसौदा लीक हो गया है। इज़राइल के चैनल 12 और 'द न्यूयॉर्क पोस्ट' के हवाले से सामने आई यह रिपोर्ट बताती है कि इस ऐतिहासिक समझौते में प्रतिबंधों को हटाने, परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने और सबसे महत्वपूर्ण-रणनीतिक रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर बेहद चौंकाने वाले प्रावधान शामिल हैं।
इस बेहद गोपनीय दस्तावेज़ को सबसे पहले 'Axios' के जाने-माने पत्रकार बराक राविद ने दुनिया के सामने लाया। शुरुआत में इसे 14-पॉइंट का समझौता माना जा रहा था, लेकिन फिलहाल इसके 12 मुख्य प्रावधान सार्वजनिक हुए हैं। इस समझौते का सबसे पहला और बड़ा असर यह होगा कि ईरान, अमेरिका और उनके सहयोगी देश पूरे क्षेत्र में-जिसमें अशांत लेबनान भी शामिल है-तत्काल प्रभाव से लड़ाई और सैन्य कार्रवाइयां बंद कर देंगे। इस शांति समझौते के तहत तेहरान वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह कसम दोहराएगा कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। इसके बदले में अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा, नए प्रतिबंधों पर रोक लगाएगा और क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक भेजने से तौबा करेगा।
दस्तावेज़ का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा है। दुनिया के तेल व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से मतभेद रहे हैं। प्रस्ताव के अनुसार ईरान 60 दिनों तक व्यावसायिक जहाजों को सुरक्षित और टोल-फ्री मार्ग देने की गारंटी देगा। लेकिन पर्दे के पीछे नई समुद्री सुरक्षा व्यवस्था और संभावित शुल्क प्रणाली पर भी चर्चा चल रही है। यही वह बिंदु है जो आने वाले समय में सबसे बड़ा विवाद या समझौता साबित हो सकता है।
समझौते के वित्तीय प्रावधान और भी हैरान करने वाले हैं। यदि यह 12-पॉइंट फॉर्मूला सफल रहता है, तो 60 दिनों के भीतर होने वाले अंतिम समझौते के तहत अमेरिका को महज 30 दिनों के अंदर मध्य पूर्व से अपनी सेना वापस बुलानी होगी और ईरान पर लगे सभी कड़े प्रतिबंध हटाने होंगे। इसके बाद खुलेगा ईरान के लिए $300 अरब (300 बिलियन डॉलर) के विशाल पुनर्निर्माण फंड का रास्ता। ईरान को पूरी उम्मीद है कि अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देश इस फंड में बड़ा योगदान देंगे ताकि प्रतिबंधों से तबाह हुई उसकी अर्थव्यवस्था को दोबारा जिंदा किया जा सके। हालांकि, वाशिंगटन ने सार्वजनिक रूप से ईरान को किसी भी तरह का सीधा नकद भुगतान करने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे इस भारी-भरकम रकम की गारंटी को लेकर एक गहरा रहस्य बन गया है।
प्रस्तावित समझौते के अनुसार ईरान दोबारा यह वादा करेगा कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। इसके साथ ही दोनों देश संवर्धित यूरेनियम के मौजूदा भंडार और भविष्य की परमाणु गतिविधियों पर विस्तृत बातचीत शुरू करेंगे। जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति बनाए रखेगा।
मसौदे का सबसे रणनीतिक बिंदु अमेरिकी सैन्य उपस्थिति से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार अंतिम समझौते के लागू होने के 30 दिनों के भीतर अमेरिका क्षेत्र से अपनी सेना वापस बुला सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह मध्य पूर्व की शक्ति-संतुलन व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव माना जाएगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिंदु पर सबसे अधिक राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिया है कि समझौते का पूरा पाठ जानबूझकर सार्वजनिक नहीं किया गया। उनका कहना है कि पाकिस्तान, कतर और अन्य मध्यस्थ देशों की भूमिका के कारण कई संवेदनशील कूटनीतिक पहलुओं को अभी गोपनीय रखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि पर्दे के पीछे बातचीत अभी भी जारी है और कई महत्वपूर्ण शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं।
यदि यह प्रस्ताव वास्तविक समझौते में बदलता है तो मध्य पूर्व में दशकों से चले आ रहे तनाव, प्रतिबंधों और सैन्य टकराव के दौर का अंत शुरू हो सकता है। लेकिन सवाल अभी भी बरकरार है-क्या अमेरिका और ईरान इस बार अपने वादों पर टिक पाएंगे, या यह भी इतिहास के कई अधूरे समझौतों की तरह केवल एक और कूटनीतिक दस्तावेज बनकर रह जाएगा? आने वाले 60 दिन इस सवाल का जवाब तय करेंगे।
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