
US Iran Peace Deal: क्या दुनिया पिछले चार महीनों से चल रहे विनाशकारी महायुद्ध के खात्मे की दहलीज पर खड़ी है, या यह सिर्फ एक और खौफनाक तूफान से पहले की शांति है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक सनसनीखेज दावा करते हुए एलान किया कि रविवार (14 जून) को ईरान के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौता साइन होने वाला है। इस समझौते के तहत तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर 'नो न्यूक्लियर वॉल' खड़ी की जाएगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा।
लेकिन इस एलान के चंद घंटों बाद ही तेहरान ने इस दावों की धज्जियां उड़ा दीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बघाई ने स्पष्ट किया कि रविवार को किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होंगे। दोनों महाशक्तियों के बीच अभी भी 5 ऐसी 'रेड लाइन्स' (अड़चनें) बनी हुई हैं, जो इस शांति समझौते को किसी भी वक्त मलबे में तब्दील कर सकती हैं।
ईरान डील के हिस्से के तौर पर अरबों डॉलर के फ्रीज किए गए एसेट्स को तुरंत रिलीज करने और सभी प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है। तेहरान का कहना है कि कोई भी एग्रीमेंट US की तरफ से ठोस एक्शन से शुरू होना चाहिए, खासकर उनके ब्लॉक किए गए फंड के बारे में। इन भरोसे के बिना, ईरान के प्रस्तावित शर्तों पर सहमत होने की संभावना नहीं है।
ईरान ने US पीस डील पर शक जताया है, इसे US प्रपोज़ल की 'गलत समझ' बताया है। ईरानी अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि किसी भी डील में सैंक्शन में राहत की साफ़ समझ होनी चाहिए और गोलमोल वादों को खारिज करना चाहिए। यह दोनों देशों के बीच चल रहे अविश्वास को दिखाता है।
ईरान सिविलियन मकसदों के लिए यूरेनियम को एनरिच करने के अपने अधिकार को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जबकि वह अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को पूरी तरह से रोकने की US की मांग का विरोध कर रहा है। तेहरान का कहना है कि उसकी न्यूक्लियर क्षमताओं पर कोई भी चर्चा पीस डील के लिए तुरंत की शर्तों के बजाय लंबे समय की बातचीत का हिस्सा होनी चाहिए।
IRGC leadership : Neither Iran will handover its enriched uranium nor stop its long range missile program. Iran will continue taking toll for vessels crossing the Strait of Hormuz
So, the agreement is being reached to lift sanctions on Iran & provide it with billions of dollars? pic.twitter.com/kYHVBDHiTe— Baba Banaras™ (@RealBababanaras) June 14, 2026
ट्रंप प्रशासन का मुख्य एजेंडा यह है कि ईरान हमेशा के लिए परमाणु हथियार बनाने का विचार छोड़ दे। वॉशिंगटन एक बेहद कड़े और नए 'इंस्पेक्शन सिस्टम' को लागू करना चाहता है। लेकिन सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि क्या ईरान अपने पूरे परमाणु बुनियादी ढांचे को नष्ट करेगा या केवल यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) को सीमित करेगा?
ट्रंप के लिए यह चुनौती राजनीतिक भी है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) को हमेशा सबसे कमजोर डील बताया है। अब किसी भी नए समझौते की तुलना उसी से होगी। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि वे ईरान में सिविलियन पावर प्लांट के विचार से परेशान नहीं हैं, लेकिन कड़े वेरिफिकेशन की मांग पर ईरान लगातार अड़ा हुआ है।
ईरान के पास मौजूद समृद्ध यूरेनियम का विशाल भंडार इस समय दुनिया के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है, जिसका अधिकांश हिस्सा जमीन के नीचे अत्यधिक गहराई में महफूज है। अमेरिका की मांग है कि ईरान को यह खतरनाक सामग्री पूरी तरह सरेंडर करनी होगी।
प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, अंतरिम व्यवस्था के तहत इस यूरेनियम को "मौके पर ही नष्ट (Downblend) करना और फिर देश से बाहर ले जाना" शामिल है। राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद लिखा कि अमेरिका आखिरकार ईरान की बची हुई "न्यूक्लियर डस्ट" (परमाणु सामग्री के अवशेष) को हासिल करेगा और उसे नष्ट कर देगा। लेकिन इतने बड़े और संवेदनशील भंडार को ईरान से बाहर ले जाना कूटनीतिक और तकनीकी रूप से एक खौफनाक पहेली बना हुआ है।
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के बीच की खाई बहुत गहरी है। ईरान इस समझौते के बदले अपनी फ्रीज की गई लगभग 24 अरब डॉलर की संपत्ति तक तुरंत पहुंच और प्रतिबंधों से पूरी आजादी चाहता है।
ट्रंप का कड़ा रुख: "ओबामा द्वारा ईरान को किए गए अरबों डॉलर के कैश पेमेंट के विपरीत, इस बार कोई पैसे का लेन-देन नहीं होगा।"
हालांकि, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने आर्थिक फायदों का लालच जरूर दिया है, लेकिन ईरान का गुस्सा सिर्फ प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों में अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को खोने और तबाह हुए बुनियादी ढांचे के बदले ईरान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुकसान के रूप में 270 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग कर रहा है, जिसे देने के लिए वॉशिंगटन कतई तैयार नहीं है।
रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग को लेकर दावों का खेल जारी है। ट्रंप का कहना है कि समझौता होते ही यह रास्ता तुरंत खुल जाएगा। ईरानी समाचार एजेंसी 'मेहर' के मुताबिक, इसे 30 दिनों के भीतर खोलने की व्यवस्था पर बात चल रही है, जिसके तहत तेहरान वहां से बारूदी सुरंगें (माइंस) हटाएगा और वॉशिंगटन अपनी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करेगा।
परंतु, असली पेंच नियंत्रण को लेकर फंसा है। ईरान की सरकारी मीडिया 'IRNA' ने साफ कर दिया है कि शर्तों के मसौदे में जलडमरूमध्य पर ईरान का प्रबंधन छोड़ने या अमेरिकी-इजरायली सैन्य हमलों से पहले की स्थिति को बहाल करने का कोई वादा शामिल नहीं है। यानी, इस जलमार्ग पर वर्चस्व की जंग अभी खत्म नहीं हुई है।
इस शांति समझौते की पांचवीं और सबसे संवेदनशील रेड लाइन है मिडिल ईस्ट में सक्रिय ईरान समर्थित सशस्त्र समूह (हिज्बुल्लाह और हमास)। मार्च से लेबनान में भड़की भीषण जंग में अब तक 3,400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। ईरान ने लेबनान में इजरायली हमलों के विरोध में इस महीने की शुरुआत में बातचीत तक रोक दी थी।अमेरिका का दावा है कि ईरान इन आतंकवादी समूहों को फंड न देने पर सहमत हो गया है, लेकिन ईरान ने सार्वजनिक रूप से इसकी कोई पुष्टि नहीं की है। इजराइल किसी भी समझौते के बावजूद स्वतंत्र रूप से सैन्य कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है, जो ईरान को कतई मंजूर नहीं है। जब तक इन पांच सुलगते सवालों के जवाब नहीं मिल जाते, तब तक ट्रंप की 'संडे डील' एक ऐतिहासिक शांति की शुरुआत भी हो सकती है और एक भयानक विनाशकारी धोखे की प्रस्तावना भी।
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