क्या है बर्थराइट सिटिज़नशिप? US सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप को झटका, भारतीयों को राहत

Published : Jul 01, 2026, 09:56 AM IST
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सार

US सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की बर्थराइट सिटिज़नशिप नीति को झटका दिया। फैसला H-1B वीज़ा वाले भारतीय परिवारों के बच्चों के लिए बड़ी राहत, नागरिकता का अधिकार बरकरार।

वाशिंगटन: व्हाइट हाउस और अमेरिकी न्यायपालिका के बीच चल रही अब तक की सबसे बड़ी कानूनी जंग का अंत हो गया है। यूनाइटेड स्टेट्स सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे महत्वाकांक्षी 'एंटी-इमिग्रेशन एजेंडे' की धज्जियां उड़ा दी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के उस विवादित एग्जीक्यूटिव ऑर्डर (कार्यकारी आदेश) को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसके जरिए वे अमेरिका में 'बर्थराइट सिटिज़नशिप' (जन्मसिद्ध नागरिकता) को खत्म करना चाहते थे। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स की अगुवाई में अदालत ने साफ कर दिया कि अमेरिकी सरजमीं पर जन्म लेने वाला हर बच्चा पैदाइशी अमेरिकी नागरिक है। इस फैसले से अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय मूल के परिवारों ने राहत की सांस ली है, जिन पर डिपोर्टेशन और नागरिकता छिनने की तलवार लटक रही थी।

'जूस सोली' का चक्रव्यूह: चीफ जस्टिस की वो टिप्पणी जिसने ट्रंप का प्लान किया फेल

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सस्पेंस यह था कि क्या सुप्रीम कोर्ट अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन की नई व्याख्या करेगा? ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि "अधिकार क्षेत्र के भीतर" (Subject to the jurisdiction thereof) वाक्यांश उन बच्चों को बाहर रखता है जिनके माता-पिता अस्थायी वीज़ा पर हैं या गैर-कानूनी तरीके से रह रहे हैं। लेकिन चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत की राय लिखते हुए इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।

1898 का फैसला फिर बना आधार, क्या है वोंग किम आर्क केस?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में United States v. Wong Kim Ark का भी हवाला दिया। इस ऐतिहासिक मामले में कोर्ट ने फैसला दिया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चे, चाहे उनके माता-पिता किसी भी देश के नागरिक हों, अमेरिकी नागरिकता के हकदार हैं। यही फैसला पिछले एक सदी से ज्यादा समय से अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता का संवैधानिक आधार बना हुआ है। जस्टिस सोनिया सोटोमेयर, एलेना कगन, एमी कोनी बैरेट और केतनजी ब्राउन जैक्सन के साथ मिलकर लिखे फैसले में रॉबर्ट्स ने कहा कि अमेरिकी धरती पर पैदा हुए बच्चे जन्म से ही नागरिक हैं। अदालत ने 1898 के ऐतिहासिक 'यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क' मामले की मिसाल को बरकरार रखा, जो एक सदी से भी अधिक समय से अडिग है।

ग्रीन कार्ड का खतरनाक बैकलॉग: भारतीयों के लिए क्यों जीवन-मरण का था यह सवाल?

साउथ एशियन अमेरिकन जस्टिस कोलैबोरेटिव (SAAJCO) द्वारा अदालत में पेश किए गए आंकड़ों ने इस केस के पीछे छिपे असली डर को उजागर किया था। अमेरिका में रहने वाले 48 लाख भारतीय-अमेरिकियों में से करीब 16 लाख लोग जन्म के अधिकार से अमेरिकी नागरिक बने हैं। लेकिन सबसे डरावनी हकीकत कैटो इंस्टीट्यूट की वह स्टडी है, जिसमें कहा गया है कि अमेरिका के रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड बैकलॉग (लंबित आवेदनों) में 63% हिस्सेदारी अकेले भारतीयों की है।

नवंबर 2023 तक 12 लाख से ज्यादा भारतीय EB-1, EB-2 और EB-3 कैटेगरी में ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे थे। अगर कानून नहीं बदला, तो 2030 तक यह आंकड़ा 22 लाख पार कर जाएगा। ऐसे में H-1B वीज़ा जैसे अस्थायी स्टेटस पर दशकों तक इंतजार करने वाले भारतीय माता-पिता के लिए ट्रंप का आदेश एक बुरे सपने जैसा था। अगर यह आदेश लागू हो जाता, तो उनके अमेरिका में पैदा होने वाले बच्चों से नागरिकता छीन ली जाती। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने इन परिवारों को एक बहुत बड़ी सुरक्षा गारंटी दे दी है।

क्या है बर्थराइट सिटिज़नशिप और क्यों है विवाद?

बर्थराइट सिटिज़नशिप का मतलब है कि किसी व्यक्ति को उस देश की नागरिकता मिल जाती है जहां उसका जन्म हुआ है। इसे लैटिन शब्द जूस सोली (Jus Soli) यानी "मिट्टी का अधिकार" भी कहा जाता है। अमेरिका में यह अधिकार संविधान के 14वें संशोधन से जुड़ा है, जिसे गृहयुद्ध के बाद नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए लागू किया गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह नियम उन बच्चों पर लागू नहीं होना चाहिए जिनके माता-पिता अमेरिकी नागरिक नहीं हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

ट्रुथ सोशल पर ट्रंप का गुस्सा: 'शी जिनपिंग को बधाई' और नया प्लान

इस करारी हार से बौखलाए राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा की तरह सोशल मीडिया का सहारा लिया। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर इस फैसले को "महंगी और गलत पॉलिसी" करार दिया। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने इस फैसले के बाद तंज कसते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को मज़ाक में बधाई दे डाली, जिसका सीधा इशारा था कि वे इस फैसले को चीन की कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। हालांकि, ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) से तुरंत एक्शन लेने की मांग की है। ट्रंप ने लिखा: "सुप्रीम कोर्ट ने बर्थराइट सिटिज़नशिप को सही ठहराया, जो हमारे देश के लिए बहुत बुरी है। लेकिन हम कांग्रेस में कानून बनाकर इसे आसानी से खत्म कर सकते हैं। इसके लिए किसी लंबे कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट की ज़रूरत नहीं है! कांग्रेस को आज ही इस पर काम शुरू करना चाहिए, उन्हें मेरा पूरा सपोर्ट मिलेगा।"

 

 

क्या संसद में पलटेगा फैसला? दुनिया की नजरें अब वाशिंगटन पर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने फिलहाल के लिए तो लाखों अप्रवासियों और भारतीय टेक-वर्कर्स के बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर दिया है, लेकिन ट्रंप की इस नई धमकी ने एक नया सस्पेंस पैदा कर दिया है। क्या ट्रंप प्रेसिडेंशियल सपोर्ट के जरिए अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पास करवा पाएंगे जो 14वें संशोधन को बाईपास कर सके? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान को साधारण कानून से नहीं बदला जा सकता, लेकिन ट्रंप के अड़ियल रुख को देखते हुए आने वाले दिनों में अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी में एक नया सियासी घमासान मचना तय है।

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