
नई दिल्ली: पराली जलाने पर रोक के लिए राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों पर असंतोष जताया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कहा है कि जिस तरह अन्य अपराधों पर नियंत्रण के लिए कानूनों को लागू किया जाता है उसी तरह राज्य सरकारों को वायु प्रदूषण रोकने को लेकर जिम्मेदारी निभानी चाहिए। एनजीटी ने कहा कि तथ्य यह है कि अधिकारियों द्वारा किए गए प्रयासों के बाद भी जमीनी स्तर पर पराली जलाई जा रही है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। निकाय ने कहा कि पराली जलाए जाने के लिए किसी अधिकारी को जवाबदेह नहीं ठहराया जा रहा है।
प्रदूषण को रोकने के लिए भी लागू हो कानून
एनजीटी के आदेश में कहा गया है कि अन्य अपराधों को रोकने के लिए कानून लागू किए जाने की तरह ही राज्य पर प्रदूषण को रोकने के लिए भी कानून लागू करने की जिम्मेदारी है। राज्य ऐसा प्रभावी रूप से नहीं कर रहे हैं। राज्यों को पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए अपने अधिकारियों की नाकामी पर उचित कार्रवाई करनी चाहिए। अधिकरण ने कहा कि जागरूकता पैदा करने की, प्रोत्साहन देने या दंडात्मक कार्रवाई करने की रणनीति हो सकती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य अपने कर्तव्य का पालन करने में नाकाम रहे हैं।
प्रदूषण मुक्त वातावरण हर नागरिक का अधिकार
न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली एनजीटी की एक पीठ ने कहा, ‘‘वायु प्रदूषण का लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण मुक्त वातावरण हर नागरिक का अधिकार है और हर राज्य का दायित्व है। केंद्र और राज्यों का यह रूख कि वे असहाय हैं, स्वीकार्य नहीं है। पीठ ने चिंता जताते हुए कहा कि पांच साल में भी अगर राज्य सरकार किसानों को पराली जलाए बिना फसलों की बुवाई की तकनीक के बारे में नहीं बता सकी तो यह ‘‘अप्रिय स्थिति’’ है जिसे दूर करने की जरूरत है।
(यह खबर समाचार एजेंसी भाषा की है, एशियानेट हिंदी टीम ने सिर्फ हेडलाइन में बदलाव किया है।)
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