Jagannath Rath Yatra 2026: सबसे बड़ा रहस्य! हर साल इस मजार पर क्यों रुकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

Published : Jul 16, 2026, 09:42 AM IST

Muslim devotee of Jagannath: ओडिसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 16 जुलाई से शुरू हो चुकी है। इस रथयात्रा से जुड़े अनेक रोचक फैक्ट हैं, जिनके बारे में कम ही लोगों को पता है।

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जानें जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़े रोचक फैक्ट...

Jagannath Rath Yatra Facts: ओडिशा के पुरी में निकाली जाने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा दुनिया के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक आयोजनों में से एक है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं। रथयात्रा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इन्हीं में से एक परंपरा है कि भगवान जगन्नाथ का रथ एक मुस्लिम भक्त की मजार के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। आखिर यह मुस्लिम भक्त कौन था और भगवान जगन्नाथ का रथ उसकी मजार पर क्यों रुकता है? आगे जानिए ये रोचक कथा…

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कौन थे भगवान जगन्नाथ के मुस्लिम भक्त?

प्रचलित मान्यता के अनुसार, किसी समय पुरी में सालबेग नाम का एक मुगल सैनिक रहता था। उनकी माता हिंदू थीं। एक बार सालबेग गंभीर रूप से घायल हो गए। उस समय माता के कहे अनुसार उन्होंने भगवान जगन्नाथ की भक्ति शुरू की। इसके बाद वे स्वस्थ हो गए। ऐसा होने से उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति और भजन-कीर्तन में समर्पित कर दिया।


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कभी मंदिर नहीं जा पाए सालबेग

सालबेग भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे, लेकिन मुस्लिम होने के कारण उन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद उनकी आस्था कभी कम नहीं हुई। उन्होंने भगवान जगन्नाथ की महिमा में अनेक ओड़िया भजन लिखे, जिन्हें आज भी श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इसलिए सालबेग को भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े भक्तों में से एक माना जाता है।

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क्यों रुकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

सालबेग की मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में पुरी में एक मजार बनाई गई। जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा उस स्थान से गुजरी, तो रथ अपने आप वहीं रुक गया। काफी प्रयासों के बाद भी रथ आगे नहीं बढ़ा। तब श्रद्धालुओं ने इसे भगवान का अपने भक्त के प्रति प्रेम और सम्मान माना। जैसे ही भक्त सालबेग का स्मरण किया गया, रथ फिर आगे बढ़ गया। तभी से हर वर्ष भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा के दौरान नंदीघोष रथ सालबेग की समाधि के सामने कुछ समय के लिए रोका जाता है। इस परंपरा को भगवान और भक्त के अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है।



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