Pitru Paksha 2026: श्राद्ध में ब्राह्मण भोज से लेकर कौए को खाना खिलाने तक, जानें 5 परंपराओं का कारण

Published : Sep 29, 2026, 03:15 PM IST

Pitru Paksha Traditions: हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष को बहुत ही पवित्र समय माना गया है। इन दिनों में पितरों की आत्मा की शांति के लिए कईं तरह के उपाय किए जाते हैं। श्राद्ध से जुड़ी कईं परंपराएं भी हैं जो इसे और भी खास बनाती हैं।

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जानें श्राद्ध की इन परंपराओं की वजह

Shradh Traditions: श्राद्ध पक्ष वैसे तो 16 दिनों का होता है लेकिन इस बार तिथि क्षय होने से ये 15 दिनों का ही रहेगा। इसकी शुरूआत 26 सितंबर से हो चुकी है, जो 20 अक्टूबर तक रहेगा। श्राद्ध के दौरान लोग अपने पितरों का शांति के लिए पिंडदान और तर्पण आदि उपाय करते हैं। श्राद्ध पक्ष से जुड़ी कईं परंपराएं भी हैं जिनके पीछे कोई न कोई कारण छिपा है। आगे जानिए ऐसी ही 5 परंपराओं के बारे में…

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परंपरा 1: श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन क्यों कराया जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराना जरूरी माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में पितृ भी भोजन ग्रहण करते हैं। इसलिए श्रद्धा और सम्मान के साथ भोजन कराने पर पितृ प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। भोजन के बाद ब्राह्मणों को आदरपूर्वक विदा करने की भी परंपरा है।

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परंपरा 2: श्राद्ध के भोजन में खीर क्यों बनाई जाती है?

श्राद्ध में खीर बनाने की परंपरा पितरों के सम्मान और तृप्ति से जुड़ी मानी जाती है। जैसे अतिथियों को मिठाई के साथ भोजन कराया जाता है, उसी भावना से पितरों के लिए खीर बनाई जाती है। एक मान्यता यह भी है कि वर्षा ऋतु के बाद खीर-पूड़ी जैसे पौष्टिक भोजन शरीर को ऊर्जा देते थे, इसलिए यह परंपरा शुरू हुई।


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परंपरा 3: कौओं, गाय और कुत्तों को भोजन क्यों दिया जाता है?

धर्म ग्रंथों में कौए को पितरों और यम का प्रतीक माना गया है, इसलिए उन्हें भोजन कराया जाता है। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास माना गया है, जबकि कुत्ता यमराज का पशु माना गया है। इसी कारण श्राद्ध के भोजन का एक अंश इन जीवों को देने की परंपरा है।

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परंपरा 4: कुशा की अंगूठी क्यों पहनी जाती है?

श्राद्ध कर्म के समय अनामिका उंगली में कुशा (एक प्रकार की विशेष घास) की अंगूठी धारण की जाती है। कुशा को पवित्र माना गया है और मान्यता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। कुशा की अंगूठी पहनने का अर्थ है कि व्यक्ति पवित्र भाव से पितरों के लिए श्राद्ध कर रहा है।

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परंपरा 5: अंगूठे से जल क्यों अर्पित किया जाता है?

श्राद्ध में तर्पण करते समय अंगूठे से जल देने की परंपरा है। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, अंगूठे के पास का स्थान पितृ तीर्थ कहलाता है। मान्यता है कि इस स्थान से दिया गया जल पितरों तक पहुंचता है और उन्हें तृप्ति प्रदान करता है।



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