Pradosh Vrat 2026: 16 या 17 जनवरी, कब करें प्रदोष व्रत? जानें डेट, पूजा विधि, मंत्र और मुहूर्त

Published : Jan 14, 2026, 03:13 PM IST

Pradosh Vrat 2026: साल 2026 के पहले महीने जनवरी में शुक्र प्रदोष का शुभ योग बन रहा है। शुक्र प्रदोष का व्रत करने से महादेव के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की कृपा भी भक्तों पर बनी रहती है।

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किस तिथि पर करते हैं प्रदोष व्रत?

Pradosh Vrat January 2026: हर महीने के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि बहुत ही खास होती है क्योंकि इन दोनों ही तिथियों को महादेव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत किया जाता है। ये व्रत जिस वार को होता है, उसी के अनुसार इसका नाम होता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, प्रदोष व्रत सबसे पहले चंद्रदेव ने किया था। साल 2026 के पहले महीने जनवरी में शुक्र प्रदोष का शुभ संयोग बन रहा है। आगे जानें शुक्र प्रदोष की डेट, पूजा विधि, मंत्र और मुहूर्त…


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जनवरी 2026 में कब है शुक्र प्रदोष?

पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी, गुरुवार की रात 08 बजकर 16 मिनिट से शुरू होगी जो 16 जनवरी की दोपहर की रात 10 बजकर 21 मिनिट तक रहेगी। चूंकि त्रयोदशी तिथि का सूर्योदय 16 जनवरी, शुक्रवार को उदय होगा, इसलिए इसी दिन शुक्र प्रदोष का व्रत किया जाएगा।


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16 जनवरी शुक्र प्रदोष शुभ मुहूर्त

16 जनवरी, शुक्रवार को पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05 बजकर 47 मिनिट से शुरू होगा जो रात 08 बजकर 29 मिनिट तक रहेगा। यानी भक्तों को पूजा के लिए पूरे 02 घण्टे 42 मिनट का समय मिलेगा। इस दिन सुस्थिर सहित कईं शुभ योग बनेंगे जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है।

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शुक्र प्रदोष व्रत-पूजा विधि

16 जनवरी, शुक्रवार की सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूरी तैयारी कर लें। मुहूर्त शुरू होने पर शिवलिंग स्थापित कर इसका जल से अभिषेक करें। फिर गाय के दूध से और पुन: एक बार जल से अभिषेक करें। शिवलिंग पर फूलों की माला चढ़ाएं और शुद्ध घी का दीपक लगाएं। इसके बाद एक-एक करके बिल्व पत्र, धतूरा, आंकड़े के फूल, आदि चीजें अर्पित चढ़ाते रहें। पूजा के दौरान ऊं नम: शिवाय का जाप करते रहें। अंत में भोग लगाकर आरती करें। पूजा से बाद सात्विक भोजन करें।

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भगवान शिव की आरती (Lord shiva Aarti Lyrics in Hindi)

जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव
अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा
ओम जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव
अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे स्वामी पंचांनन राजे
हंसानन गरुड़ासन हंसानन गरुड़ासन
वृषवाहन साजे ओम जय शिव ओंकारा
दो भुज चारु चतुर्भूज दश भुज ते सोहें स्वामी दश भुज ते सोहें
तीनों रूप निरखता तीनों रूप निरखता
त्रिभुवन जन मोहें ओम जय शिव ओंकारा
अक्षमाला बनमाला मुंडमालाधारी स्वामी मुंडमालाधारी
त्रिपुरारी धनसाली चंदन मृदमग चंदा
करमालाधारी ओम जय शिव ओंकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगें स्वामी बाघाम्बर अंगें
सनकादिक ब्रह्मादिक ब्रह्मादिक सनकादिक
भूतादिक संगें ओम जय शिव ओंकारा
करम श्रेष्ठ कमड़ंलू चक्र त्रिशूल धरता स्वामी चक्र त्रिशूल धरता
जगकर्ता जगहर्ता जगकर्ता जगहर्ता
जगपालनकर्ता ओम जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका स्वामी जानत अविवेका
प्रणवाक्षर के मध्यत प्रणवाक्षर के मध्य
ये तीनों एका ओम जय शिव ओंकारा
त्रिगुण स्वामीजी की आरती जो कोई नर गावें स्वामी जो कोई जन गावें
कहत शिवानंद स्वामी कहत शिवानंद स्वामी
मनवांछित फल पावें ओम जय शिव ओंकारा
ओम जय शिव ओंकारा प्रभू जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव
अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा
ओम जय शिव ओंकारा प्रभू हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव
अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा


Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

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