Kavad Yatra History: क्यों निकालते हैं कावड़ यात्रा, कैसे शुरू हुई ये परंपरा?

Published : Jul 22, 2024, 09:33 AM ISTUpdated : Jul 22, 2024, 09:34 AM IST
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सार

Kavad Yatra Ki Katha: सावन मास भगवान शिव को बहुत प्रिय है। इस महीने में की गई शिव पूजा से हर तरह की परेशानी दूर हो सकती है। इस महीने में कावड़ यात्रा निकालने की परंपरा भी है। 

Sawan 2024: भगवान शिव की भक्ति का महीना सावन 22 जुलाई, सोमवार से शुरू हो चुका है। इस महीने में हर भक्त अपने-अपने तरीके से महादेव को प्रसन्न करने का प्रयास करता है। कुछ लोग एक स्थान से पवित्र जल लेकर दूसरे स्थान पर जाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, इसे कावड़ यात्रा कहते हैं। सबसे पहले कावड़ यात्रा की जाती है, इस बारे में कईं कथाएं प्रचलित हैं। आगे जानिए कावड़ यात्रा से जुड़ी ऐसी ही एक था…

किसने की थी सबसे पहली कावड़ यात्रा? (Story Of Kavad Yatra)
- धर्म ग्रंथों के अनुसार, भगवान परशुराम ने जब संसार से क्षत्रियों का नाश कर दिया तब एक दिन वे मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ) आए और यहां आकर उन्होंने पुरा नामक स्थान पर विश्राम किया। ये स्थान उन्हें बहुत सुंदर लगा और उन्होंने वहां एक मनमोहक शिव मंदिर बनाया।
- इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना के लिए वे शिला यानी पत्थर लाने के लिए हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे। उन्होंने मां गंगा को पूरी बात बताई एक शिवलिंग के लिए उत्तम शिला देने को कहा। ये सुनकर गंगा तट के किनारे स्थित सभी पत्थर रोने लगे क्योंकि वे देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे।
- उनका मां गंगा के प्रति इतना प्रेम देखकर भगवान परशुराम ने कहा कि ‘जो शिला शिवलिंग के रूप में स्थापित होगी, शिव भक्त उसका कलयुग के अंत तक गंगा जल से अभिषेक करें। ये सुनकर पत्थर प्रसन्न हो गए और देवी गंगा ने एक उत्तम शिला परशुराम भगवान को दे दी।
- भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से कावड़ यात्रा की शुरूआत हुई। तभी से हर साल शिव भक्त गंगा जल लेकर यहां आते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। चाहे कैसी भी स्थिति हो शिव भक्तों का उत्साह कभी कम नहीं होता।


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