Ram Mandir Donation Scam: कौन थे श्रीराम के भक्त ‘काकभुशुंडि’, क्यों आए चर्चा में?

Published : Jun 25, 2026, 11:20 AM IST
Ram Mandir Donation Scam

सार

Ayodhya Ram Mandir News: राम मंदिर में हुए कथित घोटाले के बाद ऋषि काकभुशुंडि में अचानक चर्चा में आ गए हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि काकभुशुंडि कौन थे?

Who Was Kakbhushundi: अयोध्या राम मंदिर दान में हुए कथित घोटाले को लेकर रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं। बहुत से लोग दान की गई चीजों की रसीद न दिए जाने की शिकायत लेकर सामने आ रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जिसमें एक महिला ने दावा किया है कि उन्होंने मंदिर के ट्रस्ट्री चंपत राय को चांदी से बनी काकभुशुंडि की प्रतिमा दान की थी। उन्हें आज तक इस दान की कोई रसीद नहीं दी गई। आगे जानिए क्या है पूरा मामला और कौन थे काकभुशुंडि?

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क्या है पूरा मामला?

अनिता भारद्वाज नाम की एक महिला ने दावा किया है कि उन्होंने चांदी से बनी काकभुशुंडि की प्रतिमा मंदिर के ट्रस्ट्री चंपत राय को दान में दी थी और इसे राम दरबार में स्थापित करने का आग्रह किया था। तब चंपत राय ने इस दान की रसीद बाद में देने का कहा था। बाद में अनिता में पत्र लिखकर चंपत राय से दान की रसीद मांगी जो उन्हें अभी तक नहीं मिली और न ही काकभुशुंडि की प्रतिमा के बारे में जानकारी दी।

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कौन थे काकभुशुंडि?

धर्म ग्रंथों में काकभुशुंडि को भगवान श्रीराम के महान भक्तों में से एक बताया गया है। इनके बारे में रामचरितमानस के उत्तरकांड में विस्तृत वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा है वे एक अमर ऋषि थे, जिन्होंने कौए (काक) का रूप धारण किया था, इसी कारण उनका नाम काकभुशुंडि पड़ा। काकभुशुंडि परम ज्ञानी थे, उन्हें अनेक कल्पों तथा युगों का ज्ञान प्राप्त था। उन्होंने ही भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को श्रीराम की महिमा और रामकथा सुनाई थी।

विद्वान ब्राह्मण से कौए कैसे बने काकभुशुंडि?

प्रचलित कथा के अनुसार काकभुशुंडि पूर्व जन्म में एक विद्वान ब्राह्मण थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे, लेकिन उन्हें अपने ज्ञान और तपस्या पर बहुत अहंकार था। एक बार गुरु ने उन्हें भगवान विष्णु और श्रीराम की भक्ति के बारे समझा रहे थे लेकिन उन्होंने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया। गुरु के अनादर और अंहकार के चलते महादेव ने उन्हें कौए (काक) की योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। कौआ बनने के बाद वे श्रीराम के नाम का निरंतर स्मरण करते रहे। जिससे उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। बाद में महादेव ने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

 

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