Jagannath Rath Yatra 2023: देवी लक्ष्मी क्यों तोड़ती हैं भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया, जानें क्या है परंपरा?

Published : Jun 23, 2023, 02:28 PM ISTUpdated : Jun 24, 2023, 08:39 AM IST
Jagannath Rath Yatra 2023

सार

Jagannath Rath Yatra 2023: हर साल आषाढ़ मास में उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। ये रथयात्रा गुंडिचा मंदिर जाकर समाप्त होती है। इस दौरान और भी कई परंपराओं का पालन किया जाता है, जो बहुत ही दिलचस्प होती हैं। 

उज्जैन. भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध यात्रा 20 जून, मंगलवार को निकाली गई, जो अपने तय समय पर गुंडिचा मंदिर पहुंच चुकी है। यहां भगवान जगन्नाथ (Jagannath Rath Yatra 2023) अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विश्राम कर रहे हैं। इस दौरान और भी कई परंपराओं का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक है देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया तोड़ना। इसे हेरा पंचमी कहते हैं। आगे जानिए इस परंपरा के बारे में…

देवी लक्ष्मी क्यों तोड़ती हैं भगवान जगन्नाथ का रथ?
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, रथयात्रा के दौरान जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं तो तीसरे दिन यानी आषाढ़ शुक्ल पंचमी तिथि पर देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए वहां आती हैं। साथ नहीं लाने की बात पर देवी लक्ष्मी क्रोधित होकर भगवान जगन्नाथ के रथ का एक पहिया तोड़ देती हैं और नाराज होकर पुरी के हेरा गोहिरी साही में बने अपने मंदिर में वापस लौट जाती हैं।

भगवान जगन्नाथ मनाते हैं देवी लक्ष्मी को
जब भगवान जगन्नाथ को ये पता चलता है तो वे देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए वहां जाते हैं। इस दौरान भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को कईं बेशकीमती चीजें और मिठाई भेंट करते हैं, जिन्में रसगुल्ले विशेष रूप से होते हैं। काफी कोशिश के बाद देवी लक्ष्मी मान जाती हैं और ये शर्त रखती हैं आगे से ऐसी भूल नहीं होनी चाहिए। इस तरह ये रुठने-मनाने की परंपरा सालों से चली आ रही है। इस परंपरा को हेरा पंचमी कहते हैं।

इस दिन वापस लौटेंगे भगवान जगन्नाथ
लगभग 9 दिनों तक अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर में रुकने के बाद भगवान जगन्नाथ आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि को पुन: अपने मंदिर में लौटते हैं। इसे बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है। इस बार ये तिथि 28 जून, बुधवार को है। मंदिर पहुंचने के अगले दिन सोना वेष, अधरपडा, नीलाद्रि विजय आदि परंपराएं तय समय पर निभाई जाती हैं।

 

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Disclaimer : इस आर्टिकल में जो भी जानकारी दी गई है, वो ज्योतिषियों, पंचांग, धर्म ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित हैं। इन जानकारियों को आप तक पहुंचाने का हम सिर्फ एक माध्यम हैं। यूजर्स से निवेदन है कि वो इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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