Mahabharat Interesting Facts: महाभारत युद्ध में पांडव और कौरव सेना के लिए कौन बनाता था भोजन?

Published : Jun 08, 2024, 04:35 PM IST
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सार

Mahabharat Interesting Facts: हिंदू धर्म में महाभारत ग्रंथ का विशेष स्थान है। विद्वानजन इसे पांचवां वेद भी कहते हैं। इस ग्रंथ में अनेक ऐसी रोचक बातें हैं जिनके बारे में कम ही लोगों को पता है। 

Interesting stories of Mahabharata: महाभारत भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है। श्रीमद्भागीता जैसा अनमोल रत्न भी ज्ञान के इसी समुद्र से हमें मिला है। महाभारत से जुड़ी अनेक रोचक बातें हैं, जिनके बारे में कम ही लोगों को जानकारी है। ये बात तो सभई जानते हैं कि कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों और कौरवों के बीच 18 दिनों तक युद्ध चलता रहा, लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि इस दौरान इन दोनों सेनाओं के लिए भोजन की व्यवस्था किसने की। आगे जानिए इससे जुड़ी खास बातें…

जब उडूपी राजा को बुलाने गए कौरव-पांडवों के प्रतिनिधि
जब युद्ध होना निश्चित हो गया तो कौरव और पांडव अपने-अपने पक्ष में अन्य राज्यों के राजा को बुलाने लगे। कुछ राजा कौरवों के पक्ष में आ गए तो कुछ ने पांडवों का साथ दिया। उसी समय कौरव और पांडवों के प्रतिनिधि उडूपी राज्य के राजा से मिलने गए और अपने-अपने पक्ष में युद्ध के लिए उन्हें आमंत्रित किया। दोनों पक्षों की बातें सुनकर उडुपी नरेश तय नहीं कर पाए कि वह किसकी ओर से युद्ध लड़ें।

श्रीकृष्ण से मिले उडूपी के राजा
कौरव और पांडवों दोनों का साथ देते हुए उडूपी के राजा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचें और कहा कि ‘भाइयों के बीच में होने वाले इस भयानक युद्ध का मैं समर्थन नहीं करता, लेकिन इसे टाला भी नहीं जा सकता। इसलिए बिना शस्त्रों के माध्यम से इस युद्ध में भाग लेने का कोई उपाय हो तो वह मुझे बताईए।’

श्रीकृष्ण ने दिया सुझाव
उडूपी नरेश की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘कुरुक्षेत्र में होने वाले इस भयानक युद्ध में 18 अक्षोहिणी सेनाएं आमने-सामने होंगी। ऐसे में इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए भोजन का प्रबंध करना एक चुनौति होगी। आप युद्ध में भाग लेने वाली दोनों सेनाओं के लिए भोजन का प्रबंध करें तो इस तरह आप बिना शस्त्र के भी इस युद्ध में भाग ले सकते हैं।’

युधिष्ठिर ने की प्रशंसा
श्रीकृष्ण की बात मानकर उडूपी नरेश ने 18 दिनों तक चलने इस भयानक युद्ध में दोनों ओर के सैनिकों के लिए प्रतिदिन भोजन का प्रबंध किया। युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने राजतिलक समारोह के दौरान उडुपी नरेश की प्रशंसा करते हुए उन्हें बिना शस्त्र के युद्ध लड़ने वाले राजा के नाम से सुशोभित किया।


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