Unique Temple: वृंदावन के इस मंदिर में है रहस्यमयी दरवाजा, जो साल में खुलता है एक बार

Published : Dec 01, 2025, 03:23 PM IST
Unique Temple

सार

Unique Temple: वृंदावन में स्थित श्रीरंगनाथ मंदिर बहुत खास है। क्योंकि ये वृंदावन का एक मात्र मंदिर है जो दक्षिण शैली में बना है और यहां दक्षिण भारतीय परंपराओं के अनुसार ही भगवान की पूजा भी की जाती है। इससे जुड़ी कईं रोचक मान्यताएं भी हैं।

Ranganatha Temple Vrindavan: वृंदावन का श्रीरंगनाथ मंदिर अपना आप में बहुत खास है। यहां भगवान श्रीकृष्ण को रंगनाथ के नाम से पूजा जाता है। उत्तर भारत का ये मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तु कला में बना हुआ है और यहां दक्षिण भारत से जुड़ी धार्मिक परंपराओं से ही पूजा की जाती है। इस मंदिर में एक खास दरवाजा है जिसे वैकुंठ द्वार कहते हैं। ये दरवाजा साल में सिर्फ एक बार वैकुंठ एकादशी पर भी खुलता है। भक्तों को इस दरवाजे के खुलने का खास इंतजार रहता है। आगे जानिए इस मंदिर से जुड़ी खास बातें…

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क्यों खास है श्रीरंगनाथ मंदिर का ये दरवाजा?

वृंदावन का रंगनाथ मंदिर पूरे साल भक्तों के लिए खुला रहता है, लेकिन इस मंदिर का एक द्वार साल में सिर्फ एक ही बार खुलता है, वैकुंठ एकादशी पर। इसे दरवाजे को वैकुंठ द्वार कहते हैं। वैकुंठ द्वार को खोलने से पहले 21 दिन तक मंदिर में एक खास उत्सव मनाया जाता है। उत्सव के 11वें दिन वैकुंठ द्वार खोला जाता है, जिसे देखने भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है जो इस द्वार को पार कर लेता है, उसे वैकुंठ में स्थान मिलता है।

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पालक में बैठते हैं भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी

मंदिर की परंपरा के अनुसार, वैकुंठ एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा को पालकी में बैठाकर वैकुंठ द्वार से निकाला जाता है। उनके साथ ही हजारों भक्त भी इस द्वार को पार करते हैं ताकि उन्हें वैकुंठ में स्थान मिल सके। इस मान्यता से जुड़ी एक कथा है, उसके अनुसार प्रसिद्ध संत आलवर ने एक बार ने भगवान विष्णु से वैकुंठ जाने का मार्ग पूछा, तब भगवान ने कहा कि जो भक्त वैकुंठ एकादशी पर इस द्वार को पार करेगा, उसे वैकुंठ लोक में स्थान मिलेगा। तभी से ये परंपरा चली आ रही है।

अनोखी है भगवान विष्णु की प्रतिमा

इस मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की प्रतिमा भी बहुत खास है। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजित हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही है। प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा इक्ष्वाकु ने ये प्रतिमा तपस्या के फलस्वरूप ब्रह्मजी से मांगी थी। जब ये अयोध्या में स्थापित हुई। बाद में इसे श्रीराम से विभीषण ने मांग लिया। ले जाते समय विभीषण ने ये प्रतिमा कुछ देर के लिए यहां रखी तो ये यहीं पर स्थापित हो गई। तभी से इसकी पूजा यहां हो रही है। वहीं इस मंदिर का निर्माण 1851 में एक जैन व्यापारी ने करवाया था।


Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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