Exclusive: अभिनव बिंद्रा ने बताया क्या था जिंदगी का सबसे शर्मनाक पल, कौन सा काम था क्रेजी, मेंटल हेल्थ जरूरी

Published : Jul 01, 2022, 07:00 PM IST
Exclusive: अभिनव बिंद्रा ने बताया क्या था जिंदगी का सबसे शर्मनाक पल, कौन सा काम था क्रेजी, मेंटल हेल्थ जरूरी

सार

बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने अभिनव बिंद्रा ने कहा कि चैंपियन बनने से ज्यादा जरूरी चैंपियन की तरह खेलना। उन्होंने कई और बातें भी बताईं।  

नई दिल्ली. ओलंपिक चैंपियन खिलाड़ी अभिनव बिंद्रा ने ओडिशा के कुछ स्कूलों में ओलंपिक एजुकेशन प्रोग्राम शुरू किया है, जिससे बच्चों में खेल के प्रति पाजिटिव भावना पैदा होगी। आने वाले समय में हजारों खिलाड़ी तैयार होंगे जो देश के लिए मेडल जीतकर लाएंगे। अभिनव कहते हैं कि राज्य सरकारें मदद करें तो यह प्रोग्राम अन्य राज्यों में भी चलाया जा सकता है। स्वभाव से बेहद शर्मीले अभिनव बिंद्रा से जब कुछ खास पलों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने गंभीरता से इसका जवाब दिया। अभिनव ने जिंदगी के भी कुछ खास लम्हों के बारे में जिक्र किया। 

क्या था जिंदगी का सबसे शर्मनाक पल
लाइफ के सबसे इंब्रेसिंग मोमेंट के बारे में अभिनव ने कहा कि मेरी लाइफ में खासकर स्पोर्ट्स में कई पल ऐसे आए जो मेरे लिए शर्मनाक थे। ऐसा कोई एक पल तो याद नहीं लेकिन मैंने जो सीखा है, वह ये है कि मैं अपनी गलतियों पर हंसना जानता हूं। हमारे कोच ने भी यही सिखाया कि अपनी गलतियों पर खुद हंसो। वैसे एक बार की बात है कि मैं किसी खास प्रतियोगिता के फाइनल स्टेज में था और मैं अपना एम्युनेशन ही भूल गया। आप सोचिए कि शूटिंग करने जा रहे हैं और आपके पार बुलेट्स ही नहीं हैं। यह मेरे लिए काफी शर्मनाक था क्योंकि मुझे दूसरे साथी से बुलेट्स लेनी पड़ी।

जीतने से ज्यादा पार्टिसिपेट करना जरूरी
ओलंपिक चैंपियन अभिनव बिंद्रा ने कहा कि हम हमेशा मजबूत इकोनामी की बात करते हैं लेकिन आप दुनिया के देशों को देखेंगे तो पता चलेगा कि जो देश मजबूत हैं, वे स्पोर्ट्स में भी सुपर पावर हैं। स्पोर्ट्स मजबूत समाज का आधार है। इसलिए हमने यह शुरूआत की है। हमने यह पायलट प्रोजेक्ट ओडिशा से शुरू किया जिसे बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है। मूल बात यह है कि हम किसी तरह का तनावपूर्ण माहौल खेलों में नहीं बनाना चाहते, जहां जीतने का ही दबाव होता है। आप ये समझिए कि ओलंपिक में भी दुनिया भर के 10 हजार से ज्यादा एथलीट भाग लेते हैं लेकिन उनमें से 300 होते हैं, जो गोल्ड लेकर वापस लौटते हैं। लेकिन बाकियों को आप लूजर नहीं कह सकते हैं। उन्होंने खेल को आगे बढ़ाने का काम किया है। दरअसल, स्पोर्ट्स हमारी सोसायटी को आकार देने का काम करता है। 

मानसिक स्वास्थ्य रहे बेहतर
बिंद्रा ने कहा कि हमें फेलियर से डील करने की जरूरत है। फिजिकल ट्रेनिंग न सिर्फ हमें शारीरिक तौर पर मजबूत बनाता है बल्कि यह हमारे मेंटल हेल्थ के लिए भी फायदेमंद होता है। एथलीट्स को अक्सर इंजरी से भी गुजरना होता है। कई बार फिजिकल इंजरी होती है, मेंटल इंजरी होती है। हमें यह समझना चाहिए कि एथलीट भी सामान्य इंसान होते हैं। दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां जीतने के लिए मानवीय संवदेनाओं को भी नजरअंदाज किया जाता है। कई बार एथलीट्स से अमानवीय व्यवहार भी होता है। हमें एथलीट्स को पाजिटिव माहौल देना चाहिए और मानवीय व्यवहार करना चाहिए ताकि वे बिना किसी मानसिक दबाव के बेहतर कर सकें। 

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