आखिरी सफर में उमड़ा जनसैलाब! पद्म विभूषण तीजन बाई को राजकीय सम्मान के साथ दी गई विदाई

Published : Jul 05, 2026, 06:11 PM IST
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सार

पद्म विभूषण और विश्वविख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई को उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। जानिए उनके संघर्ष, लोककला में अतुलनीय योगदान, सम्मान और भारतीय संस्कृति पर छोड़ी अमिट विरासत की पूरी कहानी।

लोककला की दुनिया का एक ऐसा स्वर रविवार को हमेशा के लिए मौन हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू को दुनिया के बड़े-बड़े मंचों तक पहुंचाया। विश्वविख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का उनके पैतृक गांव गनियारीमें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। हजारों लोगों की मौजूदगी में प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, साहित्यकारों और आम नागरिकों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।

राज्य सरकार के निर्देशानुसार अंतिम संस्कार के दौरान राजकीय सम्मान से जुड़ी सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं। गांव में शोक और सम्मान का ऐसा वातावरण था, जहां हर व्यक्ति अपने तरीके से लोककला की इस महान साधिका को अंतिम प्रणाम कर रहा था।

पंडवानी को गांव से उठाकर विश्व मंच तक पहुंचाने वाली आवाज

डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोकगायन शैली को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई। महाभारत की कथाओं को अपने प्रभावशाली अभिनय, दमदार आवाज और जीवंत प्रस्तुति के साथ सुनाने की उनकी कला ने भारत ही नहीं, विदेशों में भी लाखों लोगों को भारतीय लोकसंस्कृति से परिचित कराया।

ग्रामीण परिवेश से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और समर्पण की मिसाल माना जाता है। सीमित संसाधनों और अनेक सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो भारतीय लोककला के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

पद्मश्री से पद्म विभूषण तक, सम्मानों से सजा जीवन

भारतीय लोककला में असाधारण योगदान के लिए डॉ. तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषणसहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी कला ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाई और लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी उपलब्धियां केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने भारतीय लोककला को वैश्विक सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बनाने में भी अहम योगदान दिया।

एक युग का अंत, लेकिन विरासत रहेगी अमर

डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। गनियारी में अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद हजारों लोगों ने उनकी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। भले ही आज उनकी आवाज शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी की वह ओजस्वी परंपरा, जिसे उन्होंने अपने जीवनभर संजोया और दुनिया तक पहुंचाया, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। भारतीय लोकसंस्कृति के इतिहास में उनका नाम सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।

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