
रायपुर। गांधी जयंती के मौके पर शुक्रवार को छत्तीसगढ़ की ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया गया। इसी दौरान नारायणपुर जिले के दूरस्थ और कभी नक्सल प्रभाव से प्रभावित रहे ओरछा विकासखंड के कच्चापाल गांव से लोकतंत्र की एक अलग तस्वीर सामने आई। यहां बड़ी संख्या में ग्रामीण एक पेड़ की छांव में जमा हुए और ग्राम सभा के दौरान गांव की जरूरतों और विकास से जुड़े मुद्दों पर खुलकर चर्चा की।
कच्चापाल की यह ग्राम सभा इसलिए खास रही क्योंकि बस्तर के जिन इलाकों में कभी नक्सलियों की तथाकथित ‘जन अदालतों’ का डर लोगों के बीच रहा, उन्हीं क्षेत्रों में अब ग्रामीण संवैधानिक ग्राम सभा के जरिए अपनी बात रख रहे हैं। गांव के विकास की प्राथमिकताओं पर चर्चा और फैसलों में उनकी भागीदारी बदलते बस्तर की तस्वीर को सामने रखती है।
कच्चापाल में ग्राम सभा के लिए किसी बड़े भवन या सभागार की व्यवस्था नहीं करनी पड़ी। ग्रामीण गांव में ही एक पेड़ के नीचे एकत्र हुए और सामूहिक रूप से स्थानीय जरूरतों तथा प्रस्तावित विकास कार्यों पर चर्चा की। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने ग्राम सभा को खासा सक्रिय बना दिया।
बैठक में महिलाओं समेत ग्रामीणों ने भी अपनी बात रखी। स्थानीय स्तर पर किन कामों की जरूरत है, किन समस्याओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और गांव के विकास को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए, जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। साधारण माहौल में हुई यह बैठक ग्रामीण लोकतंत्र की जमीनी भागीदारी की तस्वीर पेश करती नजर आई।
गांधी जयंती पर प्रदेश की दूसरी ग्राम पंचायतों में भी विशेष ग्राम सभाएं आयोजित की गईं। इन बैठकों का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रामीणों को अपने गांव की विकास योजना तैयार करने की प्रक्रिया से जोड़ना रहा। ‘विकसित भारत-जी राम जी’ योजना के तहत विकसित ग्राम पंचायत प्लान यानी वीजीपीपी तैयार किया जाना है। इसके लिए ग्राम सभाओं में स्थानीय जरूरतों, गांव में उपलब्ध संसाधनों और जरूरी विकास कार्यों को लेकर ग्रामीणों से सुझाव लिए गए। इन सुझावों को आगे तैयार होने वाली ग्राम पंचायत विकास योजना में शामिल किया जाएगा।
विशेष ग्राम सभाओं के दौरान गांव की जरूरतों के हिसाब से विकास कार्यों की पहचान पर जोर दिया गया। इसमें जल संरक्षण, आजीविका संवर्धन और ग्रामीण अधोसंरचना जैसे विषय प्रमुख रहे। इसके साथ ही रिफॉर्म उत्सव के तहत ग्रामीणों को रोजगार और मजदूरी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई। उन्हें 125 दिवस रोजगार की वैधानिक गारंटी, समय पर रोजगार उपलब्ध कराने और मजदूरी भुगतान से संबंधित प्रावधानों के बारे में बताया गया। ग्रामीणों को योजना के तहत अनुमेय 375 प्रकार के कार्यों की जानकारी भी दी गई, ताकि स्थानीय जरूरत के मुताबिक कामों का चयन किया जा सके।
ग्राम सभाओं में ग्रामीणों से मिले सुझाव आगे बनने वाले विकसित ग्राम पंचायत प्लान का आधार होंगे। अगले चरण में गांव में उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय जरूरतों का आकलन किया जाएगा। इसके बाद विकास योजना का प्रारूप तैयार किया जाएगा।इस प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गांव की वास्तविक जरूरतों और समस्याओं की जानकारी सीधे ग्रामीणों के पास होती है। ग्राम सभा के जरिए इन्हीं जरूरतों को विकास योजना से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
नारायणपुर के दूरस्थ कच्चापाल में पेड़ के नीचे हुई यह ग्राम सभा महज एक सरकारी बैठक नहीं रही। कभी नक्सल प्रभाव से जूझ चुके इस इलाके में बड़ी संख्या में ग्रामीणों का एक साथ बैठना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी दर्ज कराना अपने आप में महत्वपूर्ण तस्वीर है।
बस्तर के जिन हिस्सों में कभी भय और हिंसा के बीच तथाकथित ‘जन अदालतों’ की चर्चा होती थी, वहां अब ग्रामीण संवैधानिक ग्राम सभा के मंच पर बैठकर अपने गांव की जरूरतों और विकास के भविष्य पर बात कर रहे हैं। कच्चापाल की यह तस्वीर स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी के बदलते स्वरूप को सामने रखती है।
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