
रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में वन धन विकास केंद्र महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बनकर सामने आए हैं। प्रधानमंत्री जनजाति विकास मिशन और प्रधानमंत्री जनमन योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के तहत राज्य में अब तक 155 वन धन विकास केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। इनमें 139 केंद्र सामान्य क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं, जबकि 16 केंद्र विशेष रूप से पिछड़ी जनजातीय समूह (पीव्हीटीजी) क्षेत्रों में बनाए गए हैं। इन केंद्रों ने महिलाओं को गांव के आसपास ही रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का रास्ता भी तैयार किया है।
वन धन विकास केंद्रों ने पारंपरिक लघु वनोपज संग्रहण कार्य को आधुनिक प्रसंस्करण तकनीकों से जोड़कर नई दिशा दी है। इन केंद्रों में केवल वनोपजों का संग्रहण ही नहीं किया जाता, बल्कि उनका प्राथमिक प्रसंस्करण कर उच्च गुणवत्ता वाले हर्बल उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। इस पहल से हजारों महिलाओं को अपने गांव के नजदीक ही नियमित रोजगार का अवसर मिला है। इससे महिलाओं की आय में बढ़ोतरी हुई है और वे आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बन रही हैं।
वन धन विकास केंद्रों से करीब 4 हजार 900 महिला स्व-सहायता समूह सीधे जुड़े हुए हैं। लगभग 55 हजार महिला सदस्य गांवों और हाट-बाजारों में वनोपज संग्रहण और प्रसंस्करण का कार्य कर रही हैं। पिछले पांच वर्षों के दौरान संग्रहण कार्य के लिए महिलाओं को लगभग 4 करोड़ रुपये का कमीशन वितरित किया गया है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।
वन धन विकास केंद्रों में केवल संग्रहण कार्य तक सीमित न रहकर मूल्य संवर्धन यानी वैल्यू एडिशन पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। लगभग 1,300 महिला समूहों की 17 हजार महिलाएं हर्बल उत्पाद तैयार करने के कार्य से जुड़ी हुई हैं। इस काम के लिए अब तक करीब 1 करोड़ रुपये का कमीशन महिलाओं को दिया जा चुका है। तैयार किए गए हर्बल उत्पादों की आपूर्ति आयुष विभाग को की जा रही है। इसी क्रम में राज्य के 4 वन धन विकास केंद्रों ने 25.17 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित कर एक सफल उदाहरण प्रस्तुत किया है।
वन धन विकास केंद्रों की यह पहल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ वनांचल क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को भी नई गति दे रही है। स्थानीय संसाधनों के उपयोग और हर्बल उत्पादों के निर्माण से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय दोनों में वृद्धि हो रही है। यह अभियान ‘लोकल फॉर वोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सोच को छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में साकार करने का काम कर रहा है।
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