Bastar Dussehra Exhibition: कांटों का झूला, 150 कारीगर और विशाल रथ, राष्ट्रपति मुर्मु ने की लोक संस्कृति की सराहना

Published : Oct 23, 2026, 05:25 PM IST
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सार

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जगदलपुर में बस्तर दशहरा प्रदर्शनी देखी। जानिए 75 दिन के इस महापर्व की अनूठी जनजातीय परंपराएं, रथ निर्माण और धार्मिक रस्में।

रायपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में बस्तर की सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं, जनजातीय परंपराओं, पारंपरिक पूजा-पद्धतियों और रथ निर्माण की अनूठी तकनीक को विस्तार से दिखाया गया। आकर्षक चित्रों और जानकारी के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि बस्तर दशहरा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां के जनजातीय समाज की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक एकता और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है।

जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित इस प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा की शुरुआत से लेकर समापन तक होने वाले प्रमुख अनुष्ठानों को क्रमवार प्रस्तुत किया गया। इसमें पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, बारसी उतरानी, नार फोड़नी, काछिन गादी, कलश स्थापना, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, बेल नेवता, निशा जात्रा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार और कुटुम्ब जात्रा जैसी परंपराओं की जानकारी दी गई।

बस्तर दशहरा क्यों है खास? 75 दिनों तक चलता है महापर्व

बस्तर दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अलग पहचान रखता है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व मुख्य रूप से आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना से जुड़ा है। इसमें बस्तर के विभिन्न जनजातीय समुदाय अपनी-अपनी परंपरागत जिम्मेदारियां निभाते हैं।

इस आयोजन की खासियत यह है कि यहां धार्मिक आस्था के साथ लोककला, पारंपरिक शिल्प, जंगल से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल और सामुदायिक भागीदारी भी देखने को मिलती है। पीढ़ियों से चली आ रही ये परंपराएं आज भी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए हुए हैं।

पाट जात्रा से होती है बस्तर दशहरा की शुरुआत

बस्तर दशहरा का शुभारंभ श्रावण अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या के दिन पाट जात्रा से होता है। इस रस्म में रथ निर्माण के लिए जंगल से लाई गई लकड़ी के विशाल तने की पूजा की जाती है। स्थानीय हल्बी भाषा में इसे 'ठुरलु खोटला' कहा जाता है। पारंपरिक पूजा और अर्पण के बाद इस तने पर निर्धारित धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं। इसके साथ ही रथ निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है। इस अनुष्ठान के जरिए देवी-देवताओं का आह्वान कर पूरे दशहरा पर्व के बिना किसी बाधा के संपन्न होने की कामना की जाती है।

डेरी गड़ाई में निभाई जाती है स्तंभ स्थापना की परंपरा

पाट जात्रा के बाद डेरी गड़ाई का अनुष्ठान होता है। इसमें करीब 10 फीट ऊंची साल की दो शाखाओं वाली लकड़ियों को सिरहासार में स्थापित किया जाता है। इन पर हल्दी, कुमकुम और चंदन लगाया जाता है और सफेद कपड़ा बांधा जाता है। पूजा के दौरान मंगरी मछली, अंडा और फूला-लाई भी पारंपरिक रूप से अर्पित किए जाते हैं। इस रस्म को स्तंभारोहण का स्वरूप माना जाता है। इसके बाद जंगल से रथ निर्माण के लिए लकड़ियां लाई जाती हैं और तय गांवों से कारीगर पहुंचने लगते हैं। इस परंपरा में बिरिंगपाल के ग्रामीणों और समरथ परिवार की विशेष जिम्मेदारी रहती है।

बस्तर दशहरा का रथ कैसे बनता है? जानिए पारंपरिक तकनीक

रथ निर्माण से पहले बारसी उतरानी की रस्म निभाई जाती है। इसमें पारंपरिक औजारों की पूजा के बाद लकड़ी पर पहली बार बारसी यानी बसुला चलाया जाता है। इसी के साथ रथ बनाने का काम औपचारिक रूप से शुरू होता है। बेड़ा उमरगांव और झाड़-उमरगांव के लगभग 150 पारंपरिक कारीगर रथ निर्माण में हिस्सा लेते हैं। वे करीब 15 से 20 दिनों में रथ तैयार करते हैं और अंतिम रथ परिक्रमा तक आयोजन से जुड़े रहते हैं।

रथ के पहियों में धुरी लगाने के लिए नार झड़नी नाम की विशेष तकनीक अपनाई जाती है। इसमें लकड़ी के पहियों के बीच गोलाकार छेद बनाए जाते हैं। पहियों को मजबूती देने के लिए लोहे की गोलाकार पट्टी, जिसे गुड़दा कहा जाता है, लगाई जाती है। यह तकनीक बस्तर के कारीगरों के पीढ़ियों से चले आ रहे तकनीकी ज्ञान और शिल्पकला को दर्शाती है।

मगरमुंही और रथ सिंघारनी की क्या है खासियत?

रथ की बनावट में मगरमुंही की अहम भूमिका होती है। रथ के पहियों की धुरी के ऊपर रखी जाने वाली करीब 40 फीट लंबी और डेढ़ फीट मोटी विशाल लकड़ियों को मगरमुंही कहा जाता है। ये रथ के मुख्य आधार और चेसिस की तरह काम करती हैं। इनका आकार मगरमच्छ जैसा होने के कारण इन्हें यह नाम मिला है।

रथ सिंघारनी के दौरान मोंगरापाल और चोलनार के ग्रामीण फूल रथ और विजय रथ को रंग-बिरंगे कपड़ों, फूलों, कागज की सजावटी सामग्री और दूसरी पारंपरिक वस्तुओं से सजाते हैं। रथ के ऊपरी हिस्से को सियाड़ी के पत्तों से बने थरला से ढका जाता है। विजय रथ पर चार घोड़ों और घुड़सवारों की आकृतियां भी लगाई जाती हैं। रथ तैयार होने के बाद उसे पहली बार आगे बढ़ाने की रस्म को रथ उसकानी कहते हैं। इससे पहले पूजा-अर्चना की जाती है और रथ की सुरक्षित परिक्रमा की कामना की जाती है।

सियाड़ी की छाल से तैयार होती है रथ खींचने की पारंपरिक रस्सी

बस्तर दशहरा में रथ खींचने के लिए आधुनिक रस्सियों की जगह सियाड़ी बेल की छाल से बनी पारंपरिक डोर का इस्तेमाल होता है। ग्रामीण जंगल से छाल लाते हैं। फिर उसे सुखाने, कूटने, भिगोने और गूंथने की लंबी प्रक्रिया से मजबूत रस्सी तैयार की जाती है। इसे रथ की मगरमुंही से बांधा जाता है।

इस डोर को मां दंतेश्वरी की आस्था और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु रथ खींचने से पहले इसे प्रणाम करते हैं। कई लोग रस्सी का छोटा टुकड़ा सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और परिवार की सुरक्षा की कामना के साथ घर में भी रखते हैं। सियाड़ी के पत्तों का इस्तेमाल दोना-पत्तल बनाने और रथ सजाने में भी किया जाता है।

काछिन गादी: देवी से अनुमति लेकर शुरू होता है दशहरा आयोजन

बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में काछिन गादी शामिल है। आश्विन अमावस्या के दिन जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछिन गुड़ी में यह अनुष्ठान होता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार, पनका समाज की एक कुंवारी बालिका पर देवी आरूढ़ होती हैं। बालिका को कांटों से बने झूले पर बैठाकर रण की देवी काछिन से दशहरा आयोजन की अनुमति और आशीर्वाद मांगा जाता है।

काछिन देवी को पशुधन, अन्न-धन की रक्षक और विभिन्न स्थानीय समुदायों की कुलदेवी माना जाता है। इस परंपरा का संबंध चालुक्य राजा दलपत देव के समय से बताया जाता है। प्रदर्शनी में वर्ष 1772 के आसपास के दौर के बाद काछिन गुड़ी के निर्माण और राजधानी को जगदलपुर स्थानांतरित किए जाने से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताओं का भी उल्लेख किया गया।

कलश स्थापना और अखंड ज्योति की परंपरा

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मां दंतेश्वरी मंदिर में कलश स्थापना के साथ नवरात्रि की पूजा शुरू होती है। इसके बाद मावली, कंकालिन, करनाकोटिन और शीतला समेत दूसरे देवी-देवताओं के मंदिरों में भी कलश स्थापित किए जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक विभिन्न मंदिरों में मनोकामना ज्योति और अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। मां दंतेश्वरी मंदिर में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु हजारों ज्योति कलश स्थापित करवाते हैं। इनकी देखरेख की परंपरागत जिम्मेदारी यादव यानी रावत समाज के सेवादार निभाते हैं। यह व्यवस्था रियासतकाल से चली आ रही है।

जोगी बिठाई: नौ दिनों तक साधना और उपवास

जोगी बिठाई बस्तर दशहरा की खास आध्यात्मिक परंपरा है। इसमें बड़े आमाबाल के एक व्यक्ति को सिरहासार में नौ दिनों तक योग-साधना और उपवास के लिए बैठाया जाता है। जोगी को मावली देवी के खांडा के साथ शोभायात्रा में सिरहासार लाया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद उन्हें एक निर्धारित गड्ढे में बैठाया जाता है। पास में अन्न खूंटा और अखंड ज्योति स्थापित की जाती है। जोगी नौ दिनों तक कठिन साधना करता है। यह अनुष्ठान इस संकल्प का प्रतीक माना जाता है कि बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के पूरा हो।

फूल रथ परिक्रमा में जुटते हैं हजारों श्रद्धालु

आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक लगातार छह दिनों तक चार पहियों वाले फूल रथ की परिक्रमा होती है। फूलों से सजाए जाने के कारण इसे फूल रथ कहा जाता है। इस दौरान मां दंतेश्वरी के मुख्य पुजारी देवी का छत्र लेकर रथ पर सवार होते हैं और हजारों ग्रामीण पारंपरिक डोर से रथ खींचते हैं।

हर परिक्रमा से पहले पूजा, नारियल अर्पण, पारंपरिक बलि और पुलिस सलामी की रस्म निभाई जाती है। जगन्नाथ मंदिर के सामने केंवट समाज की महिलाएं रथ पर लाई-चना, फूल और पान-बीड़ा अर्पित करती हैं। पूजा सामग्री उपलब्ध कराने में समरथ केंवट परिवार की पारंपरिक भूमिका रहती है।

परिक्रमा के बाद यादव और घाकड़ समाज की सुहागिन महिलाएं मां दंतेश्वरी की आरती करती हैं। शुरुआत दो महिलाओं से होती है और विजय रथ की परिक्रमा तक इनकी संख्या बढ़कर 12 हो जाती है। इससे आयोजन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है।

बेल नेवता और बेल जात्रा की परंपरा

बेल नेवता में बेल वृक्ष को देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। जुड़वां बेल फलों को भगवान शिव और मां पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। पांचवीं फूल रथ परिक्रमा के बाद सरगीपाल में बेल वृक्ष की पूजा होती है। उसकी शाखा पर लाल कपड़ा, नारियल और सुपारी बांधकर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया जाता है।

आश्विन शुक्ल सप्तमी को बेल जात्रा के दौरान राजपरिवार, पुजारी और ग्रामीण पूजा-अनुष्ठान करते हैं। जुड़वां बेल फलों को गांव की बेटी मानकर उन्हें तेल और हल्दी लगाकर विदाई दी जाती है। इसके बाद इन फलों को मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ फूल रथ में रखा जाता है और अंत में दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किया जाता है।

निशा जात्रा में आधी रात को होती है विशेष पूजा

दुर्गा अष्टमी की मध्यरात्रि में निशा जात्रा आयोजित होती है। इस दिन रथ परिक्रमा नहीं होती। निशा जात्रा गुड़ी या खमेश्वरी गुड़ी में क्षेत्रीय देवी-देवताओं की विशेष पूजा की जाती है। प्रदर्शनी में दी गई जानकारी के मुताबिक, इस अनुष्ठान में परंपरागत रूप से 11 बकरों की बलि के साथ मछली और कुम्हड़ा आदि अर्पित किए जाते हैं। देवी-देवताओं के लिए 11 कांवर यानी 22 मटकियों में चावल, दाल और खीर का भोग तैयार किया जाता है। बस्तर के अलग-अलग इलाकों से देवी-देवताओं के प्रतीक आंगा, लाट, पालकी, डोली और छत्र के साथ सिरहा तथा श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं। निशा जात्रा के बाद ये देवी-देवता भीतर रैनी और बाहर रैनी की रथ परिक्रमा में भाग लेते हैं।

मावली परघाव में मां दंतेश्वरी और मावली माता का स्वागत

मावली परघाव बस्तर दशहरा की प्रमुख स्वागत परंपरा है। इसमें दंतेवाड़ा से जगदलपुर आने वाली मावली माता की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र का भव्य स्वागत किया जाता है। मावली देवी को मां दंतेश्वरी का प्रतिरूप माना जाता है। रियासतकाल में महाराजा खुद पीली धोती पहनकर और योगी का वेश धारण कर नंगे पैर करीब सात से आठ किलोमीटर दूर तक देवी की अगवानी करने जाते थे। अब डोली और छत्र को वाहन से लाया जाता है।

नवमी की शाम जिया डेरा से मावली देवी की डोली ढोल-नगाड़ों, लोकनृत्य, आरती और आतिशबाजी के साथ कुटरू बाड़ा पहुंचती है। यहां राजपरिवार, राजगुरु, राजपुरोहित, जनप्रतिनिधि और विभिन्न देवी-देवताओं के प्रतिनिधि स्वागत करते हैं। इसके बाद राजपरिवार और मुख्य पुजारी डोली को कंधों पर उठाकर राजमहल ले जाते हैं। वहां पूजा-अर्चना के बाद देवी के छत्र और डोली को स्थापित किया जाता है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजा और विजय रथ की परिक्रमा

विजयादशमी के अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर में रियासतकालीन बंदूक, तलवार और तीर-कमान समेत पारंपरिक शस्त्रों की पूजा होती है। करीब सात फीट लंबी कालवान बंदूक की भी पूजा की जाती है, जिसे वीरांगना मेघई रानी की स्मृति से जोड़ा जाता है। भीतर रैनी में आठ पहियों वाले विजय रथ की पहली परिक्रमा होती है। इसके बाद रथ को प्रतीकात्मक रूप से चुराकर रात में कुम्हड़ाकोट ले जाकर छिपाने की परंपरा निभाई जाती है। राजा के रथ खोजने के बाद इससे जुड़ी एक सामाजिक परंपरा सामने आती है।

मान्यता के अनुसार, रथ चुराने वाले माड़िया समुदाय को दशहरा कार्यक्रमों में आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराजगी हुई थी। राजा के अपनी गलती स्वीकार करने के बाद माड़िया समुदाय के आग्रह पर उनके साथ नवाखाई की परंपरा शुरू हुई। इस रस्म को राजा और प्रजा के बीच सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है। इसके जरिए यह संदेश भी जुड़ा है कि प्रजा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है और राजा को भी अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए।

बाहर रैनी और नवाखाई में जुटते हैं हजारों देवी-देवताओं के प्रतीक

एकादशी को बाहर रैनी के तहत राजपरिवार कुम्हड़ाकोट पहुंचकर नवाखाई की रस्म निभाता है। प्रदर्शनी के अनुसार, इस अवसर पर बस्तर, छत्तीसगढ़ और दूसरे क्षेत्रों से तीन हजार से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीक एकत्र होते हैं। यहां नए अन्न का भोग लगाया जाता है। रानी-माचा, तिहार-लाड़ी और भोग-लाड़ी जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं। वापसी के दौरान अलग-अलग स्थानों पर पूजा-अर्चना होती है। राजमहल के पास पुलिस सलामी और महिलाओं की आरती के बाद मां दंतेश्वरी के छत्र को सम्मानपूर्वक मंदिर पहुंचाया जाता है।

मुरिया दरबार: जनजातीय समाज की ऐतिहासिक जनसंवाद परंपरा

प्रदर्शनी में मुरिया दरबार को भी प्रमुखता से दिखाया गया। इसकी शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी। रियासतकाल में यह राजा और जनता के बीच सीधे संवाद तथा समस्याओं के समाधान का वार्षिक मंच था। इसमें मांझी, मुखिया, चालकी, नाईक-पाईक और कोटवार अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं, शिकायतें और जरूरतें राजा के सामने रखते थे। मांझी और चालकी आदिवासी समाज तथा राजसत्ता के बीच अहम कड़ी का काम करते थे।

मांझी परगना स्तर पर सामाजिक, धार्मिक और दशहरा संबंधी जिम्मेदारियां निभाते थे और लाल पगड़ी पहनते थे। वहीं, नीली पगड़ी धारण करने वाले चालकी प्रशासनिक कार्यों, पुलिस के सहयोग और जनसमस्याओं के समाधान में भूमिका निभाते थे। प्रदर्शनी में दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्तमान में 80 मांझी और 25 चालकी पद हैं। यह परंपरा आज भी जनजातीय समाज की भागीदारी और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।

कुटुम्ब जात्रा में परिवार की तरह मिलते हैं देवी-देवता

बस्तर दशहरा के अंतिम चरण में कुटुम्ब जात्रा का आयोजन होता है। स्थानीय परंपरा में कुटुम्ब का अर्थ परिवार है। इस अवसर पर दशहरा में शामिल होने के लिए आए अलग-अलग क्षेत्रों के देवी-देवताओं को एक बड़े परिवार की तरह एकत्र किया जाता है और सम्मान के साथ विदाई दी जाती है। गीदम रोड स्थित गंगामुंडा जात्रा स्थल के मावली मंडप में देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। पारंपरिक अर्पण, क्षमा-याचना और राज्य की सुख-समृद्धि की कामना के साथ अनुष्ठान पूरे होते हैं। पुजारियों को नए वस्त्र और भेंट देकर सम्मानित किया जाता है।

इसी क्रम में भंगाराम चौक से पथरागुड़ा मार्ग पर बांस मुंडा तालाब के पास काछिन जात्रा होती है। यहां सिरहा, काछिन देवी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीकों की पूजा की जाती है। अगले साल फिर बस्तर दशहरा में शामिल होने की कामना के साथ उन्हें विदाई दी जाती है।

मां दंतेश्वरी के छत्र और मावली माता की डोली की विदाई से समापन

दंतेवाड़ा से आमंत्रित मां दंतेश्वरी का छत्र और मावली माता की डोली करीब एक सप्ताह जगदलपुर में रहने के बाद भव्य शोभायात्रा के साथ विदा की जाती है। सिंहद्वार पर पूजा-अर्चना, आरती और दर्शन के बाद राजपरिवार, पुजारी, जनप्रतिनिधि, लोक कलाकार और श्रद्धालु शोभायात्रा में शामिल होते हैं। यह यात्रा जिया डेरा तक जाती है। रास्ते में पुष्पवर्षा, आरती और पुलिस सलामी दी जाती है। विदाई के समय मावली माता को बेटी की तरह मावली जोड़ा भेंट किया जाता है। इसमें श्रृंगार सामग्री, चावल-दाल, फल-फूल और अन्य पारंपरिक भेंट शामिल रहती हैं।

दंतेवाड़ा लौटते समय डोली तेतरखुटी स्थित गंगादेई माता मंदिर और तोकापाल के बासन बुंदिन माता मंदिर में दर्शन तथा परिक्रमा करती है। आंवराभाटा में रात बिताने के बाद दंतेवाड़ा नगर में प्रवेश से पहले बोधराज देव से अनुमति लेने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद पूजा और पुलिस सलामी के साथ देवी की डोली मंदिर पहुंचती है।

बस्तर दशहरा प्रदर्शनी ने दिखाई जनजातीय संस्कृति और सामूहिक आस्था की ताकत

प्रदर्शनी में यह भी बताया गया कि बस्तर दशहरा के आयोजन में विभिन्न जनजातीय और स्थानीय समुदायों की जिम्मेदारियां पहले से निर्धारित हैं। कोई समुदाय रथ निर्माण करता है, कोई लकड़ी उपलब्ध कराता है, कोई रथ खींचने के लिए पारंपरिक रस्सी बनाता है, तो कोई पूजा सामग्री, देवी-देवताओं के स्वागत, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी संभालता है।

इस तरह बस्तर दशहरा केवल धार्मिक पूजा तक सीमित नहीं है। इसमें वन संसाधनों का पारंपरिक उपयोग, लोक शिल्प, सामाजिक संगठन, महिलाओं की भागीदारी, जनसंवाद और सामूहिक श्रम का अनूठा मेल दिखाई देता है। यही वजह है कि यह महापर्व बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का इस प्रदर्शनी का अवलोकन करना देश की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। प्रदर्शनी में सदियों पुरानी परंपराओं, देवी-देवताओं के प्रति आस्था और जनजातीय समुदायों की विशिष्ट भूमिका को विस्तार से प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रपति मुर्मु ने प्रदर्शनी को ध्यानपूर्वक देखा और बस्तर की लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता तथा प्रकृति और आस्था के अनूठे समन्वय की सराहना की।

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, वन मंत्री केदार कश्यप, बस्तर सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, कांकेर सांसद भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव और महापौर संजय पांडे सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी बीएन मीणा, कलेक्टर आकाश छिकारा, एसपी शलभ सिन्हा, पारंपरिक मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरिन, नाईक-पाईक, बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और अन्य गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे।

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