
No Qazi, No Contract, Just Pain: हैदराबाद के पुराने शहर की तंग गलियों में एक ऐसा निकाह चलन में है जो ना इस्लामिक है, ना कानूनी—और जिसका शिकार बन रही हैं गरीब मुस्लिम महिलाएं। "खुत्बा निकाह" के नाम पर हो रही ऐसी शादियों में न काजी होते हैं, न दस्तावेज़, और न ही महिला के अधिकारों की गारंटी।
Khutba Nikah से राबिया की बर्बादी: एक झूठे वादे से टूटी उम्मीदें
28 साल की राबिया ने इमरान नाम के व्यक्ति से शादी की, जो हुसैनी आलम का एक छोटा व्यापारी था। बिना काजी और निकाहनामा के बस दो गवाहों के साथ शादी कर दी गई। तीन महीने बाद इमरान गायब हो गया। राबिया अब अपने मां-बाप के घर रह रही है—बिना किसी सहारा, बिना किसी अधिकार।
राबिया कहती है, "मेरे पास कोई निकाहनामा नहीं है, तो मैं केस भी नहीं कर सकती।" गरीबी और मजबूरी ने उसके परिवार को इस शादी के लिए मजबूर किया, लेकिन अब वे खुद भी टूट चुके हैं।
सोशल वर्कर्स बताते हैं कि 2018 में व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से हटाने और 2017 में तीन तलाक पर बैन लगने के बाद ऐसे फर्जी निकाहों की संख्या तेजी से बढ़ी। अब पुरुष कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए खुत्बा निकाह का सहारा ले रहे हैं।
TOI की अंडरकवर रिपोर्ट में पता चला कि लैंगर हौज़ जैसे इलाकों में कुछ मैरिज ब्यूरो "तीन महीने के निकाह" का सौदा करते हैं। न काजी, न दस्तावेज़—बस पैसे दो और लड़की पाओ। अगर पैसे ज़्यादा दो, तो “कुंवारी” लड़की तक उपलब्ध करा देते हैं।
आफ़रीन जैसी महिलाएं जिनसे मासिक गुज़ारा भत्ते का वादा किया जाता है, उन्हें एक भी पैसा नहीं मिलता। पति शादी के कुछ ही हफ्तों बाद ग़ायब हो जाता है। महिला अकेले, लाचार और कानूनी सहारे के बिना रह जाती है।
मुफ़्ती उमर आबिदीन का साफ कहना है कि इस्लाम में ऐसा कोई अनुबंध मान्य नहीं है। “निकाह एक इबादत है, इस तरह के अनुबंध उसे अपवित्र करते हैं।”
मैरिज एजेंट और दलाल ऐसी महिलाओं को टारगेट करते हैं जो उम्रदराज़, तलाकशुदा या फिर बहुत गरीब होती हैं। उन्हें बस थोड़े पैसों और झूठे वादों का लालच देकर फंसा लिया जाता है।
इन महिलाओं के पास कोई गवाह नहीं, कोई काजी नहीं, और कोई निकाहनामा नहीं। उनके पास सिर्फ टूटी उम्मीदें, बिखरा आत्मसम्मान और एक खामोश समाज है।
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