
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह मातृत्व लाभ अधिनियम में 3 महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली महिलाओं को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश देने के प्रावधान पर विस्तृत तर्क और औचित्य पेश करें। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 की धारा 5(4) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस प्रावधान के अनुसार 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश केवल उन महिलाओं को दिया जाता है, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि यह कहने का क्या मतलब है कि बच्चे की उम्र 3 महीने या उससे कम होनी चाहिए? मातृत्व अवकाश देने का उद्देश्य क्या है? बच्चे की देखभाल करना, चाहे वह जैविक हो या किसी भी तरह की माँ? उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि केवल उस महिला को मातृत्व लाभ क्यों दिया जा रहा है, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती है।
इस पर सेंट्रल गर्वनमेंट के वकील ने कहा कि जैविक मां और गोद लेने वाली मां के बीच अंतर है और यह अंतर मातृत्व लाभ के अधिकार को प्रभावित करता है। हालांकि, न्यायालय ने इस प्रावधान को लेकर स्पष्ट स्पष्टीकरण मांगा और केंद्र से बेहतर हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा।
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रावधान को न केवल मातृत्व लाभ अधिनियम की योजना और उद्देश्य के खिलाफ बताया, बल्कि किशोर न्याय देखभाल और बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2015 ("JJ ACT") के भी विरोधाभासी बताया। उनका कहना था कि इस प्रावधान में जेजे अधिनियम और गोद लेने की प्रक्रिया को ध्यान में नहीं रखा गया है, जिसके तहत गोद लेने वाली महिलाओं के लिए बच्चों को गोद लेना, खासकर तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को बेहद मुश्किल है।
न्यायालय ने इस मामले को 4 सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया है। केंद्र को निर्देश दिया गया है कि वह इस मामले में तर्क और औचित्य पेश करे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व लाभ देने का यह प्रावधान न्यायसंगत और संविधान के अनुरूप है या नहीं।
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