
वलसाड. गर्मियां आते ही 'आम पर खास चर्चा' शुरू हो जाती है। भारत में आमों की कई प्रजातियां होती हैं। आम को फलों का राजा भी कहते हैं। इस सबके बीच गुजरात के वलसाड जिले के उमगगाम तालुका में लगा ये आम का पेड़ सैकड़ों सालों से सुर्खियों में बना हुआ है।
स्थानीय लोगों को दावा है कि 1300 साल पहले ईरान से भागकर भारत आए पारसी बसने वालों ने संजन गांव में इस स्थान पर पेड़ लगाया होगा। माना जाता है कि संजन की समुद्रतटीय बसावट पारसी प्रवासियों द्वारा स्थापित की गई थी, जिन्होंने 936 में गुजरात में शरण के लिए आवेदन किया था। इतिहासकारों के अनुसार, पारसियों ने अपने मूल शहर, ग्रेटर खुरासान) में संजन के नाम पर इस गांव को संजना नाम दिया।
ग्रेटर खुरासान या खोरासान पश्चिमी और मध्य एशिया के बीच ईरानी पठार में एक ऐतिहासिक पूर्वी क्षेत्र है। संजन कारा-कुम रेगिस्तान के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक प्राचीन शहर है। संजन मध्य एशिया के ग्रेटर खुरासान क्षेत्र में स्थित है। राजनीतिक रूप से संजन वर्तमान में तुर्कमेनिस्तान के मैरी प्रांत में है।
गुजरात के प्राचीन आम के पेड़ की कहानी
यहां के निवासियों का कहना है कि इतने साल पुराने होने के बावजूद आम के पेड़ की टहनियां जमीन के पैरेरल बढ़ रही हैं। नई जड़ें भी उसी पैटर्न में दिखाई देती हैं। यह पेड़ यहां के लोगों के लिए गौरव की बात है। वे इसकी पूजा-अर्चना करते हैं। इसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
कौन हैं पारसी
पारसी धर्म (जरथुस्त्र धर्म) विश्व का बहुत प्राचीन धर्म माना जाता है। इस धर्म की स्थापना संत ज़रथुष्ट्र ने की थी। इस्लाम की उत्पत्ति से पहले प्राचीन ईरान में जरथुष्ट्र धर्म का ही प्रचलन था। 7वीं शताब्दी में अरबों ने ईरान को जी लिया था और फिर ज़रथुष्ट्र धर्मावलम्बियों को जबरन इस्लाम में कबूलने का कहा। कुछ ईरानियों ने उनकी बात मान ली। जबकि कुछ नाव पर बैठकर भारत आ गए। भारत में वे गुजरात तट पर नवसारी में आकर बस गए।
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