
भारतीय परंपरा में जल को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि जीवन, चेतना और सृजन का आधार समझा गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में जल को दिव्य शक्ति का स्वरूप बताया गया है। इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया और इसे जनभागीदारी से जोड़ते हुए देशव्यापी अभियान का रूप दिया।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जल शक्ति मंत्रालय का गठन, जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, अमृत सरोवर मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू हुईं। इन पहलों ने जल प्रबंधन और संरक्षण को नई दिशा प्रदान की। इसी दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश में जल संरक्षण को सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप दिया है। उनके प्रयासों के कारण उन्हें प्रदेश में ‘जल नायक’ के रूप में पहचान मिल रही है।
डॉ. मोहन यादव का जल संरक्षण के प्रति समर्पण किसी एक पद या समय तक सीमित नहीं रहा। पिछले दो दशकों से अधिक समय से वे जल स्रोतों, नदियों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर लगातार कार्य कर रहे हैं। जब उन्होंने उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष का दायित्व संभाला, तभी से उज्जैन की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण को अपना लक्ष्य बनाया। मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली शिप्रा नदी के प्रति उनकी विशेष आस्था रही है। इसी सोच के तहत उन्होंने शिप्रा तीर्थ परिक्रमा जैसी पहल को बढ़ावा दिया, जिसने धार्मिक आस्था के साथ-साथ नदी संरक्षण और पर्यटन को भी नई पहचान दी। उनका मानना रहा कि किसी भी शहर या सभ्यता का स्थायी विकास तभी संभव है, जब उसके जल स्रोत सुरक्षित और संरक्षित हों। यही सोच आज मुख्यमंत्री के रूप में उनके जल संरक्षण अभियानों की आधारशिला बनी हुई है।
मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है और शिप्रा नदी उसकी आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत इस नदी से जुड़ी हुई है। सिंहस्थ महापर्व जैसे वैश्विक धार्मिक आयोजन का केंद्र भी यही नदी है। समय के साथ शहरीकरण और प्रदूषण के कारण शिप्रा नदी की स्थिति प्रभावित होने लगी थी। खान नदी और सीवेज के दूषित जल के कारण इसकी स्वच्छता पर असर पड़ रहा था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे गंभीरता से लेते हुए शिप्रा नदी के पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी।
जनवरी 2024 से उन्होंने लगातार उच्चस्तरीय बैठकों के माध्यम से अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शिप्रा में गंदा पानी मिलने से रोका जाए। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में जल शोधन संयंत्र, स्टॉप डैम और अन्य आवश्यक संरचनाओं की योजना तैयार की गई। साथ ही कान्ह नदी के दूषित जल के उपचार और उसके पुनः उपयोग की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिसंबर 2024 में घोषणा की कि आगामी सिंहस्थ-2028 में श्रद्धालु शिप्रा नदी के प्राकृतिक और स्वच्छ जल में स्नान कर सकेंगे। इसके लिए राज्य सरकार व्यापक स्तर पर योजनाएं लागू कर रही है। उन्होंने स्वयं उज्जैन के रामघाट पर स्वच्छता अभियान में भाग लेकर लोगों को जल संरक्षण और नदी स्वच्छता के लिए प्रेरित किया। मई 2026 में आयोजित शिप्रा तीर्थ परिक्रमा में शामिल होकर उन्होंने नदी संरक्षण के प्रति जनजागरण का संदेश दिया।
शिप्रा नदी को बारहमासी प्रवाह देने के लिए राज्य सरकार द्वारा लगभग 614.53 करोड़ रुपये की लागत से सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी मध्यम सिंचाई परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत शिप्रा नदी पर बैराज निर्माण, आधुनिक पंपिंग सिस्टम और जलाशय आधारित संरचनाएं विकसित की जा रही हैं। आवश्यकता के अनुसार जलाशय से पानी छोड़कर नदी में जल स्तर बनाए रखा जाएगा। परियोजना का लगभग आधा कार्य पूरा हो चुका है। इसके पूरा होने के बाद उज्जैन की पेयजल व्यवस्था मजबूत होगी और धार्मिक आयोजनों के दौरान शिप्रा का प्रवाह सुनिश्चित रहेगा।
विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2024 को रायसेन जिले में बेतवा नदी के उद्गम स्थल से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ की शुरुआत की। इस अभियान का उद्देश्य नदियों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों, चेक डैम और अन्य पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण, पुनर्जीवन और संवर्धन करना है। अभियान को जनभागीदारी से जोड़ते हुए प्रदेशभर में जल संरक्षण के हजारों कार्य किए जा रहे हैं। अब तक इस अभियान के अंतर्गत 2 लाख 40 हजार से अधिक कार्य पूरे किए जा चुके हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रशासन और आम नागरिक मिलकर जल संरक्षण को जन अभियान बना रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और जल संकट को लेकर चिंता बढ़ रही है। यूनिसेफ सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भविष्य में जल उपलब्धता को लेकर गंभीर चेतावनियां दी हैं। ऐसे समय में मध्यप्रदेश ने जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, भूजल संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी के कारण प्रदेश कई राज्यों के लिए उदाहरण बन रहा है।
जल शक्ति मंत्रालय के ‘जल संचय जनभागीदारी (JSJB) 2.0’ डैशबोर्ड के अनुसार जल संरक्षण कार्यों के आधार पर मध्यप्रदेश देश में तीसरे स्थान पर है। प्रदेश में 21 लाख 90 हजार से अधिक कार्य पूरे हो चुके हैं, जबकि बड़ी संख्या में कार्य प्रगति पर हैं। राष्ट्रीय रैंकिंग में डिंडोरी, खंडवा और शहडोल जैसे जिले शीर्ष स्थानों में शामिल हुए हैं। नगर निगम श्रेणी में भी खंडवा और इंदौर ने राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रदेश व्यापक स्तर पर कार्य कर रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में जल संरक्षण और कृषि विकास को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। जल गंगा संवर्धन अभियान के लिए 10,475 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है। प्रदेश में 65 हजार से अधिक खेत तालाब तैयार किए गए हैं। इसके अलावा हजारों डगवेल रिचार्ज संरचनाएं, अमृत सरोवर, जल संरक्षण परियोजनाएं और वॉटरशेड कार्य पूरे किए गए हैं। किसानों को ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिस्टम और कम पानी वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे जल बचत के साथ कृषि उत्पादन और किसानों की आय में भी वृद्धि हुई है।
भोपाल में आयोजित ‘सदानीरा समागम’ के दौरान विभिन्न देशों के राजनयिकों और विशेषज्ञों ने मध्यप्रदेश के जल प्रबंधन मॉडल की सराहना की। साइप्रस, फिजी, मेक्सिको, नेपाल, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और इक्वाडोर सहित कई देशों के प्रतिनिधियों ने जल संरक्षण में जनभागीदारी आधारित मॉडल को प्रभावी बताया। उन्होंने इसे अपने देशों में लागू करने की इच्छा भी व्यक्त की। यह अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता बताती है कि मध्यप्रदेश जल प्रबंधन के क्षेत्र में नई पहचान बना रहा है।
जल संरक्षण आज केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। महिलाओं, युवाओं, किसानों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी से जल संरक्षण के प्रयासों को नई गति मिली है। ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ और ‘जल संचय जनभागीदारी’ जैसी पहलें केवल वर्तमान की जरूरतों को पूरा नहीं कर रहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित भविष्य तैयार कर रही हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में एक मजबूत मॉडल बनकर उभर रहा है। यदि हर नागरिक जल बचाने का संकल्प ले, तो जल आत्मनिर्भर और समृद्ध मध्यप्रदेश का सपना और अधिक मजबूत होगा।
लेखक-श्रीराम तिवारी (CM मोहन यादव के सांस्कृतिक सलाहकार)
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