
भोपाल/उज्जैन। 3 अप्रैल का दिन मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए खास रहा। इस दिन उज्जैन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ में देश-विदेश के वैज्ञानिकों, विद्वानों और चिंतकों ने भाग लिया। इस दौरान खगोल शास्त्र, आधुनिक विज्ञान और वैदिक ज्ञान के समन्वय पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि सच्चा विकास तभी संभव है जब विज्ञान के साथ अध्यात्म भी जुड़ा हो। इसके लिए जरूरी है कि वैदिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जाए और युवाओं को बड़े स्तर पर विज्ञान से जोड़ा जाए।
सम्मेलन में उज्जैन को काल गणना नगरी के रूप में स्थापित करने और ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) के स्थान पर महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम उज्जैन के तारामंडल परिसर में आयोजित हुआ, जहां मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसका उद्घाटन किया। उनके साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और विचारक सुरेश सोनी भी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान सिंहस्थ-2028 को ध्यान में रखते हुए कई बड़ी परियोजनाओं का भूमिपूजन किया गया, जिनमें शामिल हैं:
इसके अलावा विद्यार्थी विज्ञान मंथन 2026-27 की वेबसाइट लॉन्च की गई और विज्ञान से जुड़ी पुस्तकों का विमोचन भी हुआ।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन सिर्फ धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित और खगोल का प्राचीन केंद्र भी रहा है। यहां सदियों पहले सूर्य की छाया से समय मापने की तकनीक विकसित हुई थी। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में उज्जैन को पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था और शून्य देशांतर रेखा भी यहीं से गुजरती थी। जब दुनिया समय की गणना सीख रही थी, तब उज्जैन के विद्वान खगोलीय गणनाओं में अग्रणी थे।
सीएम ने कहा कि विज्ञान मानता है कि समय और अंतरिक्ष एक-दूसरे से जुड़े हैं। हमारे शास्त्रों में भी शिव को महाकाल यानी समय के स्वामी के रूप में बताया गया है, जो इस वैज्ञानिक सत्य को दर्शाता है।
मुख्यमंत्री ने उज्जैन को साइंस सिटी के रूप में विकसित करने की बात कही। उन्होंने बताया कि 15 करोड़ रुपये से अधिक लागत से विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया गया है। सिंहस्थ 2028 को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए तैयारियां तेज हैं, जिसमें करीब 40 करोड़ श्रद्धालु आने की संभावना है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन, काशी, कांची और पुरी जैसे स्थान ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति के केंद्र हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों ने भारतीय ज्ञान को नजरअंदाज किया, लेकिन अब इसे फिर से स्थापित करने का समय है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में युद्ध की शक्ति सेना से नहीं, बल्कि ड्रोन और स्पेस टेक्नोलॉजी से मापी जाती है।
विचारक सुरेश सोनी ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने समय की गणना और ग्रहों का नामकरण किया था, जिसे आज दुनिया संडे-मंडे के रूप में अपनाती है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के साथ कला और अध्यात्म का संतुलन जरूरी है।
नीति आयोग के सदस्य वीके सारस्वत ने कहा कि पहले जीरो मेरिडियन उज्जैन से गुजरता था, लेकिन आज की शिक्षा में यह जानकारी नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि वैदिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहिए।
सम्मेलन में यह भी कहा गया कि भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए विज्ञान, तकनीक और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना होगा। युवाओं को वैज्ञानिक सोच के साथ जोड़ना बेहद जरूरी है।
इंडियन नॉलेज सिस्टम के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. एस. घंटी मूर्ति ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को पुनर्जीवित करना है। इसमें 1000 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया और विज्ञान, स्पेस, ड्रोन और सुरक्षा पर चर्चा हुई।
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