
मध्यप्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजनाओं में शामिल स्लीमनाबाद जल-सुरंग अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। 17 जुलाई को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कटनी जिले में निर्माणाधीन इस ऐतिहासिक परियोजना का निरीक्षण करेंगे। लगभग 11.952 किलोमीटर लंबी यह जल-सुरंग विंध्य पर्वतमाला के भीतर से नर्मदा नदी का जल प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी फ्लो) के माध्यम से सोन नदी के कछार तक पहुंचाएगी। परियोजना पूरी होने के बाद जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के करीब 1450 गांवों की लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई सुविधा मिलेगी, जिससे विंध्य और महाकौशल क्षेत्र की कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा।
कटनी जिले में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की ओर से बनाई जा रही यह परियोजना राज्य की सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग योजनाओं में शामिल है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं परियोजना की प्रगति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। उनका यह दौरा केवल निर्माण कार्य का निरीक्षण नहीं, बल्कि क्षेत्र के किसानों तक जल्द से जल्द सिंचाई सुविधा पहुंचाने की दिशा में सरकार की प्राथमिकता को भी दर्शाता है।
करीब 17 वर्षों तक विभिन्न तकनीकी और भूगर्भीय चुनौतियों से जूझने वाली इस परियोजना को हाल के वर्षों में तेजी मिली है। नियमित समीक्षा, त्वरित प्रशासनिक निर्णय और आवश्यक वित्तीय सहयोग के कारण अब सुरंग का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है।
यह जल-सुरंग केवल एक इंजीनियरिंग संरचना नहीं, बल्कि नर्मदा के जल को विंध्य क्षेत्र तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण परियोजना है। स्थानीय मान्यताओं में नर्मदा और सोन नदी के अलग-अलग दिशाओं में बहने की कथा का उल्लेख मिलता है। इसी क्षेत्र की जल समस्या को दूर करने के उद्देश्य से इस परियोजना को प्राथमिकता दी गई, ताकि विंध्य के सूखे इलाकों तक स्थायी सिंचाई पहुंच सके।
स्लीमनाबाद जल-सुरंग का निर्माण तकनीकी दृष्टि से बेहद कठिन माना गया। लगभग 30 मीटर गहराई में मार्बल, लाइमस्टोन और डोलोमाइट जैसी कठोर चट्टानों के बीच खुदाई की गई। निर्माण के दौरान कई स्थानों पर भारी जल रिसाव, भूमिगत गुफाएं और कमजोर चट्टानी संरचना जैसी समस्याएं सामने आईं।
कुछ चरणों में मशीनों को भी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद अत्याधुनिक जर्मन तकनीक और विशेष ग्राउटिंग तकनीक का उपयोग किया गया। राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइन और आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से गुजरने के बावजूद निर्माण कार्य सुरक्षित तरीके से पूरा किया गया।
यह परियोजना टर्न-की आधार पर हैदराबाद की निर्माण एजेंसी मेसर्स पटेल-एस.ई.डब्ल्यू. (संयुक्त उपक्रम) को सौंपी गई थी। वर्ष 2008 में इसकी स्वीकृत लागत 799 करोड़ रुपये थी। भूगर्भीय कठिनाइयों, अतिरिक्त सुरक्षा कार्यों, जल निकासी व्यवस्था और आधुनिक तकनीकों के उपयोग के कारण अब तक इस परियोजना पर लगभग 1610.47 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसमें मूल निर्माण कार्य, मूल्य समायोजन, डीवॉटरिंग सिस्टम, वर्टिकल शाफ्ट और केमिकल ग्राउटिंग जैसे कार्य शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार परियोजना का लगभग 96.66 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है।
परियोजना पूरी होने के बाद बरगी दायीं तट मुख्य नहर के माध्यम से नर्मदा का जल केवल गुरुत्वाकर्षण के सहारे आगे बढ़ेगा। इसके लिए बिजली आधारित पंपों की आवश्यकता नहीं होगी।
इसका लाभ जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के लगभग 1450 गांवों को मिलेगा। कुल 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होगी।
सुरंग के बाद बनने वाले आठ समूहों (ग्रुप) का निर्माण भी तेजी से चल रहा है। मार्च 2026 तक 44,160 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित कर किसानों को इसका लाभ मिलना शुरू हो चुका है।
सरकार की योजना के अनुसार दिसंबर 2026 तक 87,433 हेक्टेयर और दिसंबर 2027 तक कुल 1,54,693 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। परियोजना पूरी होने के बाद विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में कृषि उत्पादन, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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