
किसी भी देश की असली तरक्की सिर्फ आंकड़ों से नहीं मापी जाती। असली कसौटी यह है कि विकास का फायदा समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचा या नहीं, लोगों में खुद पर भरोसा जागा या नहीं, और क्या देश आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए अपनी जड़ों को भूल तो नहीं गया। अगर इसी चश्मे से देखें, तो बीते बारह वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विकास यात्रा बिल्कुल अलग नजर आती है। एक तरफ जहाँ डिजिटल इकोनॉमी, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आत्मनिर्भरता और सोशल सिक्योरिटी का जाल बिछा, वहीं दूसरी तरफ भारत की बरसों पुरानी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को देश के विकास की मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया गया।
मोदी सरकार की पूरी सोच ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के इर्द-गिर्द घूमती है। सबसे बड़ा काम यह हुआ कि जो लोग सालों से बैंकिंग सिस्टम से दूर थे, उन्हें सीधे वित्तीय तंत्र से जोड़ा गया। पक्के घर, शौचालय, साफ पीने का पानी, मुफ्त इलाज, राशन और उंगलियों पर मिलने वाली डिजिटल सेवाओं ने सरकार और आम जनता के बीच की दूरी को बहुत कम कर दिया है।
महिला सशक्तिकरण इस बदलाव का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा। वहीं दूसरी तरफ, अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए 'मेक इन इंडिया', 'स्टार्टअप इंडिया', 'डिजिटल इंडिया', पीएलआई स्कीम और मुद्रा योजना जैसे कदम उठाए गए। सड़कों का जाल, ट्रेन नेटवर्क का आधुनिकीकरण, नए एयरपोर्ट, मेट्रो और पोर्ट्स के विकास ने देश के कोने-कोने को जोड़कर व्यापार और रोजगार को आसान बनाया है।
इस दौर की एक बड़ी बात रही है- लंबे समय का फायदा देखकर कड़े फैसले लेने की राजनीतिक इच्छाशक्ति। जीएसटी लागू करके ‘एक राष्ट्र-एक कर’ की व्यवस्था बनाना हो, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाना हो, या फिर डिजिटल पेमेंट की क्रांति- ये सब ऐसे फैसले थे जिन्होंने पुरानी व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदल दिया। सैन्य मोर्चे पर ऑपरेशन सिंदूर से लेकर रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता और स्पेस सेक्टर में बड़ी छलांगें, ये सब इसी सोच का नतीजा हैं। लेकिन इन सबसे भी बड़ा बदलाव देश के लोगों की सोच में आया है। आज का भारत खुद को सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि दुनिया के भविष्य को दिशा देने वाली ताकत के रूप में देख रहा है। यहीं से पीएम मोदी का वह मूल मंत्र निकलता है-'विकास भी, विरासत भी'।
पिछले कुछ सालों में भारत की पुरानी पहचान और सांस्कृतिक गौरव को राष्ट्रीय आत्मविश्वास के साथ जोड़ा गया है। काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण, सोमनाथ में नए विकास कार्य और करतारपुर साहिब कॉरिडोर- इन सबने आस्था के केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है। इससे न केवल देश में धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिला है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के ढेरों अवसर भी पैदा हुए हैं। आज भारत की सांस्कृतिक विरासत को पूरी दुनिया में एक नई पहचान और सम्मान मिल रहा है।
भारत के दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में इस सांस्कृतिक विजन का असर साफ देखा जा सकता है। उज्जैन, ओंकारेश्वर, ओरछा और खजुराहो जैसे ऐतिहासिक स्थलों का विकास इसी कड़ी का हिस्सा है। जनजातीय गौरव को सम्मान देने के लिए राज्य में अभूतपूर्व काम किए गए हैं।
'प्रसाद योजना' और 'स्वदेश दर्शन योजना' के जरिए ग्वालियर-ओरछा-खजुराहो-उज्जैन-ओंकारेश्वर-मांडू-चित्रकूट जैसे आध्यात्मिक सर्किट तैयार किए जा रहे हैं। एक और बड़ा कदम 'ज्ञान भारतम् मिशन' है, जिसके तहत हमारी प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सहेजा जा रहा है। अकेले मध्य प्रदेश में 32 लाख से ज्यादा पांडुलिपियों को 'ज्ञान भारतम् ऐप' पर अपलोड किया जा चुका है, ताकि हमारी प्राचीन विद्या नई पीढ़ी तक आसानी से पहुँच सके।
प्रधानमंत्री मोदी के पूरे कार्यकाल का लब्बोलुआब यही है कि उन्होंने आधुनिक भारत की बड़ी-बड़ी आकांक्षाओं को देश के प्राचीन सांस्कृतिक ज्ञान और आत्मबोध से जोड़ दिया है। यह यात्रा सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की नहीं है, बल्कि यह गरीब के सशक्तिकरण से राष्ट्र के सशक्तिकरण की यात्रा है।
कहा जाता है कि जो देश अपनी पुरानी धरोहर पर गर्व करता है, वही अपने भविष्य को मजबूती से गढ़ सकता है। आज भारत आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति के नए मुकाम हासिल कर रहा है, और साथ ही अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान पर गर्व करना सीख रहा है। यह 'राष्ट्र प्रथम' के भाव से भारत के समग्र विकास की एक अनवरत यात्रा है।
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