
उज्जैन। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हर दौर में वैचारिक मंथन की अपनी खास भूमिका रही है। उज्जैन इसी परंपरा की महत्वपूर्ण भूमि है। उन्होंने कहा कि उज्जैन भारत की सात पवित्र नगरियों में शामिल है और इसका एक नाम ‘अवंतिका’ भी है। अवंतिका का अर्थ ऐसे स्थान से है, जिसका कभी अंत नहीं होता। यह बाबा महाकाल की नगरी है, जिसे कालों के काल के रूप में माना जाता है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव 19 सितंबर को उज्जैन के गीता भवन सभागार में आयोजित त्रि-दिवसीय युवा धर्म संसद-2026 के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्म, संत परंपरा और युवाओं की भूमिका पर विस्तार से बात रखी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि युवा धर्म संसद जैसे आयोजनों से युवाओं को अपने धर्म को समझने और उसके वास्तविक उद्देश्य को जीवन में अपनाने की प्रेरणा मिलती है। भारतीय संस्कृति का आधार ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे’ की भावना में निहित है। उन्होंने कहा कि धर्म की बुनियाद सत्य, करुणा और अनुशासन पर टिकी है। भारत की संत परंपरा ने हमेशा जीवन के गहरे रहस्यों को समझने का रास्ता दिखाया है। साधु-संत समाज में मौजूद विसंगतियों के प्रति लोगों को जागरूक करते हैं और उनसे दूर रहने की प्रेरणा भी देते हैं। डॉ. यादव ने कहा कि धर्म व्यक्ति को विषयों की आसक्ति से अनासक्ति की ओर ले जाने और मोक्ष का मार्ग दिखाने का काम करता है।
युवा धर्म संसद में देश के अलग-अलग राज्यों से आए संतों और प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने त्रेता युग के भगवान श्रीराम और महर्षि विश्वामित्र से जुड़े प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राजा दशरथ के समय महर्षि विश्वामित्र भगवान श्रीराम और उनके भाई श्री लक्ष्मण को अपने साथ वन में लेकर गए थे। विश्वामित्र दूरदृष्टि रखने वाले ऋषि थे। उनके मार्गदर्शन में श्रीराम और लक्ष्मण ने मारीच, सुबाहु समेत कई आसुरी शक्तियों का सामना किया और धर्म की रक्षा की।
इसके बाद भगवान श्रीराम ने स्वयंवर में धनुष उठाकर माता जानकी से विवाह किया। मुख्यमंत्री ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि जीवन में सफलता बिना संघर्ष के नहीं मिलती। जहां कठिनाई आती है, वहीं से हिम्मत और आत्मविश्वास की जरूरत बढ़ जाती है। चुनौतियों के बाद सफलता मिलती है और विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने वाला व्यक्ति आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जीवन में संसाधन सीमित हों, तब भी हिम्मत और आत्मविश्वास के सहारे विजय हासिल की जा सकती है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सभी को राधाष्टमी की शुभकामनाएं भी दीं। उन्होंने कहा कि ‘राधे-राधे’ बोलने मात्र से श्रीकृष्ण का स्मरण हो जाता है। उन्होंने राधाजी के जीवन में आए कष्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जीवन से भी संघर्ष और आस्था की प्रेरणा मिलती है। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह संबंध आज भी समाज के लिए प्रेरणादायी है। कठिन समय में मित्र की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। उन्होंने महाभारत से जुड़े एक प्रसंग का भी उल्लेख किया और कहा कि महाभारत के मुख्य युद्ध से पहले कौरवों और पांडवों ने राजा द्रुपद के खिलाफ भी एक बड़ा युद्ध लड़ा था।
समापन समारोह में पूज्य श्री मिथलेशशरण नंदिनी महाराज ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति कृतज्ञ होना जानता है, वही वास्तविक अर्थों में मनुष्य है। उन्होंने कृतघ्नता को मनुष्य के मूल स्वभाव के विपरीत बताया। उन्होंने कहा कि भारत को उसकी अपनी संस्कृति और चरित्र के आधार पर पुनः स्थापित करने के लिए युवा धर्म संसद जैसे आयोजन होते रहने चाहिए। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को धर्म, संस्कृति, देश और समाज की सेवा की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं।
कार्यक्रम में उज्जैन सिंहस्थ 2028 का भी उल्लेख हुआ। वक्ताओं ने कहा कि सिंहस्थ के नव्य, भव्य और दिव्य आयोजन की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को मिली है। उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। श्री मिथलेशशरण नंदिनी महाराज ने कहा कि बाबा महाकाल ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को देश और दुनिया से आने वाली ऋषि परंपराओं के स्वागत का दायित्व सौंपा है। कार्यक्रम के अंत में सेवा प्रतिष्ठानम के राष्ट्रीय सचिव माधव जी ने युवा धर्म संसद में शामिल सभी अतिथियों, संत-वृंद, प्रबुद्धजनों और युवा शोधार्थियों के प्रति आभार जताया। उन्होंने आयोजन का प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया।
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