Vikramotsav 2026: वाराणसी में सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य, 50 लाख रीच के साथ MP-UP सांस्कृतिक संगम ने रचा इतिहास

Published : Apr 07, 2026, 09:08 AM IST
vikramotsav 2026 varanasi

सार

वाराणसी में आयोजित विक्रमोत्सव 2026 में सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य ने इतिहास रच दिया। MP और UP के सांस्कृतिक संगम, 50 लाख डिजिटल रीच, पर्यटन MoU और भव्य आयोजन ने भारतीय संस्कृति को नई पहचान दी।

भोपाल। भारतीय इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए यादगार बन जाते हैं। अप्रैल 2026 की शुरुआत में धर्म नगरी वाराणसी में ऐसा ही एक ऐतिहासिक आयोजन हुआ। बाबा विश्वनाथ की काशी और बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन के आध्यात्मिक मिलन ने ‘विक्रमोत्सव-2026’ को एक भव्य सांस्कृतिक उत्सव बना दिया। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग और महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ द्वारा आयोजित 3 दिवसीय महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति और गौरव को पुनर्जीवित करने का प्रयास था।

ऐतिहासिक शुरुआत: दो राज्यों के सुशासन का संगम

इस भव्य आयोजन का शुभारंभ एक खास पल के साथ हुआ, जब मंच पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक साथ उपस्थित हुए। डॉ. यादव ने सम्राट विक्रमादित्य को ‘सुशासन का वैश्विक नायक’ बताया और कहा कि उनका जीवन न्याय, राष्ट्र प्रेम और प्रजा सेवा का सर्वोत्तम उदाहरण है। वहीं योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प का प्रतीक बताया और सम्राट विक्रमादित्य के अयोध्या से संबंध का उल्लेख किया।

‘मां गंगा से नर्मदा तक’: सांस्कृतिक और पर्यटन सेतु

इस आयोजन की बड़ी उपलब्धि मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच हुआ एक महत्वपूर्ण समझौता (MoU) रहा। “मां गंगा से नर्मदा तक” थीम पर आधारित इस पहल का उद्देश्य काशी विश्वनाथ और महाकालेश्वर के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को मजबूत करना है। इससे दोनों राज्यों में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और श्रद्धालुओं के लिए नए अवसर खुलेंगे।

महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य: कला और तकनीक का शानदार मेल

वाराणसी के बीएलडब्ल्यू मैदान में 3 से 5 अप्रैल तक चले इस महानाट्य ने दर्शकों को 2000 साल पीछे ले जाने का अनुभव दिया। उज्जैन के 200 से अधिक कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। युद्ध के दृश्य, जयकारे और न्याय की बत्तीसी सिंहासन की प्रस्तुति ने 80 हजार से अधिक लोगों को प्रभावित किया। ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय महाकाल’ के जयघोष ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

डिजिटल सफलता: 50 लाख से ज्यादा लोगों तक पहुंच

इस आयोजन ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी बड़ी सफलता हासिल की।

  • सोशल मीडिया के माध्यम से 51 लाख से अधिक लोगों तक पहुंच
  • ‘विक्रमोत्सव वाराणसी’ ट्रेंड में रहा
  • लोक कला यात्राओं में 15 हजार से अधिक लोगों की भागीदारी
  • प्रदर्शनी में 20 हजार से ज्यादा दर्शकों की मौजूदगी

विक्रमादित्य वैदिक घड़ी: भारतीय काल गणना का प्रतीक

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ भेंट की। यह घड़ी भारतीय पंचांग और प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान का प्रतीक है। इसकी स्थापना यह दर्शाती है कि भारत अपनी पारंपरिक समय गणना प्रणाली को फिर से महत्व दे रहा है।

मध्यप्रदेश पर्यटन और सांस्कृतिक प्रदर्शनी का आकर्षण

आयोजन में मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड का पेवेलियन खास आकर्षण रहा।

  • VR तकनीक के जरिए खजुराहो, सांची और ओरछा का अनुभव
  • ‘आर्ष भारत’ प्रदर्शनी में ऋषि-वैज्ञानिकों का योगदान
  • हस्तशिल्प और जनजातीय कला के स्टॉल्स

‘मां की रसोई’: स्वाद में भी दिखा सांस्कृतिक मेल

मध्यप्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों ने भी लोगों का दिल जीता। दाल-बाटी, पोहा-जलेबी और कुल्हड़ चाय जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए लोगों की लंबी कतारें लगीं। इसने साबित किया कि भोजन भी संस्कृति को जोड़ने का मजबूत माध्यम है।

इन्फ्लुएंसर मीट: डिजिटल युग में संस्कृति का प्रचार

इस आयोजन में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मीट का आयोजन भी किया गया। डॉ. यादव ने युवाओं से कहा कि वे अपनी संस्कृति पर गर्व करें और उसे डिजिटल माध्यम से दुनिया तक पहुंचाएं। साथ ही 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ का रोडमैप भी साझा किया गया।

एक नए सांस्कृतिक युग की शुरुआत

वाराणसी में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन की शुरुआत है। इसने यह साबित किया कि भारत की परंपरा और इतिहास आज भी जीवंत हैं और उन्हें आधुनिक माध्यमों से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच यह सांस्कृतिक जुड़ाव आने वाले समय में और मजबूत होगा।

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