
लखनऊ, उत्तर प्रदेश में पिछले 9 वर्षों के दौरान ऊर्जा क्षेत्र में संरचनात्मक और तकनीकी स्तर पर बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में उत्पादन, पारेषण और वितरण तीनों स्तरों पर क्षमता विस्तार के साथ बिजली आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय और सुलभ बनाने पर फोकस किया गया। इसका असर यह हुआ कि आज प्रदेश न केवल बढ़ती मांग को पूरा कर रहा है, बल्कि उद्योग और निवेश के लिए भी मजबूत ऊर्जा आधार तैयार कर चुका है।
प्रदेश में बिजली आपूर्ति के पैटर्न में स्पष्ट सुधार देखने को मिला है। वर्तमान में जनपद मुख्यालयों को 24 घंटे, तहसील मुख्यालयों को 22 घंटे, ग्रामीण क्षेत्रों को 20 घंटे और कृषि कार्यों के लिए 10 घंटे बिजली उपलब्ध कराई जा रही है। यह व्यवस्था पूर्व के मुकाबले अधिक स्थिर और पूर्वानुमेय बनी है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है।
बिजली वितरण नेटवर्क को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विस्तार किया गया। वर्ष 2017 से नवंबर 2025 के बीच 15,87,369 नए डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर स्थापित किए गए, जिससे इनकी कुल संख्या बढ़कर 27,91,844 हो गई। इसी अवधि में 765 नग 33\11 केवी सब-स्टेशन बनाए गए और कुल सब-स्टेशनों की संख्या 4,582 नग तक पहुंच गई। इसके साथ ही 2,455 सब-स्टेशनों की क्षमता वृद्धि भी की गई, जिससे ओवरलोडिंग की समस्या में कमी आई और आपूर्ति की गुणवत्ता बेहतर हुई।
ग्रामीण विद्युतीकरण के मोर्चे पर प्रदेश ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। वर्ष 2017 तक 1,28,494 मजरों तक सीमित बिजली आपूर्ति को बढ़ाकर 2,94,818 मजरों तक पहुंचाया गया और शत प्रतिशत विद्युतीकरण सुनिश्चित किया गया। प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) के अंतर्गत 31 मार्च 2021 तक 2.86 करोड़ से अधिक परिवारों को बिजली कनेक्शन दिए गए। इसके अलावा आरडीएसएस योजना के तहत 2,51,487 छूटे हुए घरों का भी विद्युतीकरण किया गया।
ऊर्जा क्षेत्र में उपभोक्ता सेवाओं को सरल और पारदर्शी बनाया गया है। वर्ष 2012 से 2017 के बीच 8.44 लाख कनेक्शन के मुकाबले वर्ष 2017 के बाद से 1.65 करोड़ से अधिक नए कनेक्शन जारी किए गए। झटपट पोर्टल के माध्यम से नए कनेक्शन की प्रक्रिया तेज की गई, जबकि ऑनलाइन बिल भुगतान, उपभोक्ता सेवा केंद्रों, जन सेवा केंद्रों और अन्य माध्यमों से भुगतान व्यवस्था को सुलभ बनाया गया।
प्रदेश में बिजली वितरण को तकनीकी रूप से उन्नत करने के लिए स्मार्ट मीटरिंग को तेजी से लागू किया गया। अब तक रिवैम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम के अंतर्गत 56 लाख उपभोक्ता मीटर, 2.19 लाख डीटी मीटर और 20,000 फीडर मीटर लगाए जा चुके हैं, जो 100 प्रतिशत लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। लाइनलॉस कम करने के लिए 1,24,210 सर्किट किलोमीटर एलटी लाइन को एबी केबल में बदला गया। परिणामस्वरूप वर्ष 2024-25 में लाइन लॉस घटकर 13.77 प्रतिशत रह गया। साथ ही ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्तता दर भी 1.96 प्रतिशत से घटकर 0.68 प्रतिशत और 9.31 प्रतिशत से घटकर 6.55 प्रतिशत हो गई।
पारेषण क्षेत्र में किए गए निवेश का सीधा असर आपूर्ति क्षमता पर पड़ा है। वर्ष 2016-17 में 17,890 मेगावाट की ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाकर 31,500 मेगावाट किया गया। वहीं आयात क्षमता 7,800 मेगावाट से बढ़कर 16,700 मेगावाट हो गई। वर्ष 2017 से दिसंबर 2025 तक 3 नग 765 केवी, 22 नग 400 केवी, 72 नग 220 केवी और 104 नग 132 केवी उपकेंद्र स्थापित किए गए तथा 26.091 सर्किट किलोमीटर पारेषण लाइनों का ऊर्जीकरण किया गया।
उत्पादन क्षमता में निरंतर बढ़ोतरी ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। 31 मार्च 2022 तक 29,750 मेगावाट स्थापित क्षमता को बढ़ाकर 32,259 मेगावाट किया गया, जबकि कुल अनुबंधित क्षमता 55.860 मेगावाट तक पहुंच गई है। खुर्जा 2x660 मेगावाट, घाटमपुर 3x660 मेगावाट, ओबरा सी 2x660 मेगावाट, जवाहरपुर और पनकी जैसी परियोजनाओं की इकाइयों के शुरू होने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ी है।
कृषि क्षेत्र को समर्थन देने के लिए निजी नलकूपों को मुफ्त बिजली देने का निर्णय लिया गया। अप्रैल 2022 से दिसंबर 2025 के बीच 2.42 लाख नलकूप कनेक्शन जारी किए गए। बिजली बिल राहत योजना के अंतर्गत बकाया राशि में छूट और राजस्व निर्धारण में राहत दी गई, जिससे उपभोक्ताओं पर वित्तीय दबाव कम हुआ।
प्रदेश में बिजली की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2023-24 में अधिकतम मांग 28,284 मेगावाट थी, जो 2024-25 में 30,618 मेगावाट और 2025-26 में 31,486 मेगावाट तक पहुंच गई। इस बढ़ती मांग को पूरा करने में प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था सक्षम साबित हो रही है, जो औद्योगिक विकास और निवेश आकर्षण के लिए सकारात्मक संकेत है।
2017 से पहले उत्तर प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र कई समस्याओं से जूझ रहा था। ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित घंटों की बिजली आपूर्ति होती थी और बड़ी संख्या में मजरे विद्युतीकरण से वंचित थे। पारेषण और वितरण नेटवर्क कमजोर होने के कारण बार-बार बिजली बाधित होती थी। बिजली कनेक्शन लेने की प्रक्रिया जटिल और धीमी थी, जबकि उत्पादन और ट्रांसमिशन क्षमता सीमित होने से मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर बना रहता था। पिछले 9 वर्षों में बुनियादी ढांचे के विस्तार, तकनीकी सुधार और नीतिगत फैसलों के जरिए इस स्थिति में व्यापक बदलाव आया है, जिससे उत्तर प्रदेश ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में शुमार हो गया है।
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