माघ मेले में पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत, संगम में गंगा पूजन के साथ साधु-संतों ने निभाई सनातन परंपरा

Published : Jan 05, 2026, 07:31 PM IST
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सार

प्रयागराज माघ मेले में पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत संगम में गंगा पूजन के साथ हुई। यह पांच दिवसीय परिक्रमा साधु-संतों के नेतृत्व में होती है। योगी सरकार के प्रयासों से 2019 में पुनर्जीवित यह परंपरा अब निरंतर जारी है।

प्रयागराज। प्रयागराज की सनातन परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत माघ मेला क्षेत्र में हो गई है। सोमवार को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के नेतृत्व में संगम पर विधिविधान से गंगा पूजन कर परिक्रमा का शुभारंभ किया गया।

पांच दिनों तक चलेगी पंचकोसी परिक्रमा

यह पंचकोसी परिक्रमा कुल पांच दिनों तक चलेगी। परिक्रमा के अंतिम दिन साधु-संतों के लिए भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा। माघ मेला प्रशासन को परिक्रमा के दौरान यातायात व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

गंगा पूजन के बाद अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम के दर्शन

संगम में गंगा पूजन के उपरांत साधु-संतों का जत्था अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर पहुंचा। यहां दर्शन-पूजन के बाद पहले दिन की पंचकोसी परिक्रमा का विधिवत समापन हुआ।

क्यों होती है पंचकोसी परिक्रमा

पंचकोसी परिक्रमा प्रयाग की अत्यंत प्राचीन धार्मिक परंपरा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि के अनुसार, प्रयागराज का क्षेत्रीय विस्तार पांच योजन और बीस कोस में फैला हुआ है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के छह तटों को मिलाकर यहां तीन अंतर्वेदियां बनाई गई हैं- अंतर्वेदी, मध्यवेदी, बहिर्वेदी। इन वेदियों में स्थित तीर्थ, उपतीर्थ, आश्रम, मंदिर, मठ और जलकुंडों की परिक्रमा को ही पंचकोसी परिक्रमा कहा जाता है।

पंचकोसी परिक्रमा से मिलता है अक्षय पुण्य फल

महंत हरि गिरि ने बताया कि प्रयाग आने वाले सभी तीर्थ यात्रियों को पंचकोसी परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए। इस परिक्रमा के माध्यम से क्षेत्र में विराजमान सभी देवी-देवताओं, आश्रमों और तीर्थ स्थलों के दर्शन होते हैं, जिससे श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

माघ मेले की प्रमुख परंपराओं में शामिल है पंचकोसी परिक्रमा

दिव्य और भव्य माघ मेला आयोजन में कल्पवास और पंचकोसी परिक्रमा जैसी प्राचीन परंपराएं प्रमुख रूप से शामिल हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने बताया कि पंचकोसी परिक्रमा आज से 556 वर्ष पहले तक माघ मेले का अभिन्न हिस्सा थी।

556 साल पहले अकबर ने लगाई थी रोक

महंत रविंद्र पुरी के अनुसार, मुगल शासक अकबर ने करीब 556 वर्ष पूर्व पंचकोसी परिक्रमा पर रोक लगा दी थी। इसके बाद यह परंपरा लंबे समय तक बाधित रही। साधु-संतों की निरंतर मांग और योगी सरकार के प्रयासों से वर्ष 2019 में पंचकोसी परिक्रमा को पुनः शुरू किया गया, जो अब लगातार और श्रद्धापूर्वक आयोजित की जा रही है।

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